मेरे महबूब का आना।
रूकी हुई लहरों में उठा बवाल, बेवक्त आब ने ये हरकत की। अंधेरे में चांदनी, गम में जश्न, खुदा ने बेरुखी में भी ये बरकत की। दरख़्त की खुशी छलकती यूं मदमस्त हवाओं में, पतझड़ तो न था फिर राहे हबीब में खुद को बिछा क्यूं दिया। अभी तो सावन आने में कुछ दिन और हैं, बसंती यूं महकती है जैसे नई दुल्हन ने पहला श्रृंगार किया। अचंभा सा है। मुझसे कायनात जली जली सी क्यूं लगती है, मेरा तो इन महकती फिजाओं से कोई सरोकार ही नहीं । इस जहां में वो गमे बाजार कहां? जिसका में खरीदार नहीं। पर रुको! रुको ये खुशबुएं कहां से आ रही हैं, ये इतनी शीतल चांदनी पहले तो कभी न थी मेरे आंगन में। दिल धड़क रहा है कोई महरम तो नहीं है। क्यूं चिढ़ गई मुझसे कायनात इससे पर्दा उठ गया, देखो तो चांद खुद चलकर मेरी मुढ़ेर का दीपक जो बन गया। खुशनसीबी का ये हाल बयां करने की काबिलियत कहां से लाऊं में, ये सुनहरा हुस्न लिए जन्नतों से आई हो? जरा छत पर तो आओ कि मन करता है तुम्हें दिखाकर खुदा को चिढ़ाऊं में। मौसम ए इश्क या खुदा मेहरबान है क्या पता, खताओं का मौसम है आओ हम भी करें खताओं पे खाता। ~प्रवीन ठाकुर ...