ट्रेन के सफर में मैं जिंदा होता हूं ...
कल रात को ट्रेन में बैठा तो साइड लोवर बर्थ था, बगल की सीटों पर बस दो लड़कियां बैठी थीं शायद दोनों बहन, लड़की देखकर जाने कौनसे दिमाग के कीड़े को तमीज आ जाती है कि हर जगह सही इंप्रेशन देना चाहता है। वैसे मैं खाली खिड़की के पास बैठा कान में इयरफोन डाले गीत सुन रहा होता हूं, वीडियो देख रहा होता हूं, खिड़की से बाहर देख रहा होता हूं। लेकिन जब भी आसपास लड़की हो तो मैं थोड़ा बेहतर वर्जन होना चाहता हूं अपने आप का और कल रात मैंने पेन पेपर निकालकर लिखना शुरू किया और बस जिंदगी के कुछ प्रोडक्टिव तीन घंटे, तीन घंटे में तीन गीत!! सफर वैसे रात ग्यारह बजे से सुबह पांच बजे तक का था पर फिर मैं सो गया। अब इस पोस्ट के माने क्या निकाले जाएंगे मुझे नहीं पता मुझे बस इतना पता लगा है कि आसपास थोड़ा परफॉर्मेंस प्रेसर होना चाहिए। किसी के पास इतनी हिम्मत और टाइम नहीं है कि वो आपको जज करे और बोले कि जिंदगी में स्क्रोल करना ही तेरा मकसद नहीं हो सकता। आपको अपनी वजह खुद तलाशनी होंगी। जब भी कुछ ऐतिहासिक घटित होता है, जैसे कल नीरज सर ने भाला कोंच दिया और पूरे हिंदुस्तान में करियर क्या चुनना है जै...