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Showing posts from July, 2022

शारदा नंदन।

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  है कलरव चिड़ियों का, झरनों की है आवाज। मन जोर से पहाड़ की चोटी को देखकर चीखना चाहता है, "महादेव!!!" "शंभू" "शंकरा". एक यात्रा है जो मैं कभी खत्म करना नहीं चाहता, एक समय है जो एक दिन मुझे खत्म कर देगा। एक मोक्ष समान अवस्था है, एक इच्छा है कि तीस किलो के बैग को पचास किलो का कर लेता हूं, बहुत सारे कपड़े लेकर घूमने के बजाय दो भगवा शॉल लेता हूं, टेंट जो खरीदा था वो साथ लेता हूं और खाना बनाने का सामान, फिर निकल पड़ता हूं, अपने जीवन के बोनस के दिनों का आनंद लेने, दिव्यता को समेटने, असीम, अनंत, संभावनाओं को आत्मसात करने। शंकरी, झरकटी और कंकड़ पत्थरों के रास्तों में अकेले - अकेले चलने का आनंद, साथ में चलने योग्य साथी न होने का दुख नीचे छोड़कर में ऊपर चढ़ता जा रहा हूं, नीचे एक अलीगढ़ का लड़का अपने दोस्त से मिन्नतें कर रहा है, "भाई बस चार सौ मीटर दूर है" मेरे चेहरे पर मुस्कान जैसे स्थाई होती जा रही है, जबरदस्ती का साथी खींचने के बजाय अकेले चढ़ जाओ, जहां बैठना चाहो बैठ जाओ, जहां से लौटना चाहो लौट जाओ, जहां अकेले बैठकर सोचना चाहो सोचो, विचारो और फटकार मारते...

कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय।

 कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय। तीन टीशर्ट, तीन पैंट और एक शर्ट रखके आज से एक महीने नौ दिन पहले घर से निकला था साथ में एक स्वीट शर्ट और हुडी रखी थी क्यों कि पहाड़ों का पहले से सोचकर ही निकला था। इतने दिन हो गए अलग अलग शहरों की हवा लगे, कि अब वापस लौटा नहीं जा रहा है, एक दिन सोच रहा था कहां जाऊं लौटकर हर जगह तो पूर्ण विराम लगा आया हूं, लौटने का ठिकाना कहीं छोड़ा हो तो जाया जाए।  दिल्ली दंगों के समय जब नाले में से हाथ बांधे एक लाश को निकाला गया था तब मेरे शरीर में कंपन्न होने लगा था और आवेश में मैंने कहा था कि मैं संन्यासी होकर कर्म करूंगा, वो केवल आवेश ही था, क्योंकि संन्यासी होना क्या होना होता है मैं नहीं जानता था। अगर केवल कपड़े और कपड़ों का स्टाइल बदल देने मात्र को संन्यासी होना कहते तो ये तो बिलकुल मिथ्याचार है सन्यास के नाम पर। घूमते - घूमते, सड़कों पर दुकानों पर ट्रेन के डब्बों में पहाड़ों में, बारिशों में हर जगह मैं देखने लगा क्या कोई प्रश्न अब बाकी रह गया है? तो मन खाली सा हो जाता, फिर प्रश्न करता तो क्या सारा देख लिया है, सब कुछ अनुभव कर लिया है? उत्तर आता नहीं...