शारदा नंदन।
है कलरव चिड़ियों का, झरनों की है आवाज। मन जोर से पहाड़ की चोटी को देखकर चीखना चाहता है, "महादेव!!!" "शंभू" "शंकरा". एक यात्रा है जो मैं कभी खत्म करना नहीं चाहता, एक समय है जो एक दिन मुझे खत्म कर देगा। एक मोक्ष समान अवस्था है, एक इच्छा है कि तीस किलो के बैग को पचास किलो का कर लेता हूं, बहुत सारे कपड़े लेकर घूमने के बजाय दो भगवा शॉल लेता हूं, टेंट जो खरीदा था वो साथ लेता हूं और खाना बनाने का सामान, फिर निकल पड़ता हूं, अपने जीवन के बोनस के दिनों का आनंद लेने, दिव्यता को समेटने, असीम, अनंत, संभावनाओं को आत्मसात करने। शंकरी, झरकटी और कंकड़ पत्थरों के रास्तों में अकेले - अकेले चलने का आनंद, साथ में चलने योग्य साथी न होने का दुख नीचे छोड़कर में ऊपर चढ़ता जा रहा हूं, नीचे एक अलीगढ़ का लड़का अपने दोस्त से मिन्नतें कर रहा है, "भाई बस चार सौ मीटर दूर है" मेरे चेहरे पर मुस्कान जैसे स्थाई होती जा रही है, जबरदस्ती का साथी खींचने के बजाय अकेले चढ़ जाओ, जहां बैठना चाहो बैठ जाओ, जहां से लौटना चाहो लौट जाओ, जहां अकेले बैठकर सोचना चाहो सोचो, विचारो और फटकार मारते...