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Showing posts from October, 2019

मौसमी मिजाज

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वक्त का ये सितम कैसा है कि मौसम ठंडा है और हसरतें गरम, यूं मुंह क्या बना रही हो बात को समझो ना बेरहम। यूं गुस्से में हरदम क्या रहती हो किस बात का है तुमको भरम? कौनसा हम तुमसे तुम्हारा शहर मांगते हैं, दो नज़र मुस्कुराकर देखो, इतने में ही खुद को लुटा देंगे हम। तुम्हारे चेहरे पे लिखी हुई कुछ तहरीरें पड़नी हैं, हाथ में हाथ लेकर बड़ी बड़ी बातें करनी हैं। छोड़ो कब तक शर्माओगे, इन बातें से कब तक जी चुराओगे। एक दिन रात की तरह ढल जाएगा ये हुस्न और तुम बस पछताओगे। एक कड़क चाय बनाओ पारले जी के साथ पिएंगे, थोड़ा सा सुकून और थोड़ी सी नोक - झोंक। कुछ रोना धोना कुछ हंस बोलेंगे, एक नए जीवन का दरवाजा खोलेंगे। वक्त सभी का एक दिन खत्म हो जाएगा, क्या पता कब किस का नसीब सो जाएगा। आज को जी क्यूं नहीं लेती, कल का कल देखा जाएगा।। प्रवीन ठाकुर

पुरानी यादों के कुछ दस्तावेज

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 #An_open_letter_to_all_my_relatives_familymembers_and_friends इस दिवाली मुझे मेरे स्वर्गीय नाना जी का बर्फी के प्रति प्रेम याद आया। ये स्मृति तो सामान्य सी थी या यूं कहिए दिवाली की सफाई में मेरे शरीर का CPU शायद उस फोल्डर को डिलीट कर रहा था जहां कुछ धुंधली सी पड़ी हुई फाइलें करप्ट हो गई थीं और शायद में अपने हाथ रखकर रिफ्रेश न करता तो मुझे इस आत्मीय आनंद का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। हर व्यक्ति का जीवन एक कृक्षेत्र है और वह व्यक्ति उस कृक्षेत्र का अर्जुन जिसकी व्यथा नारायण भी नहीं समझ सके और अर्जुन को समझाया कि वीर पुरुष यूं विसाद में डूबा नहीं करते। पर हे ऋषिकेश मानव सरंचना में दिमाग और दिल भी तो आप ही की देन हैं ना और अपनों के प्रति अपार मोह भी तो आप बाल्यकाल से ही निशुल्क उपहार में देते हो। इन्हीं सोच में पड़कर दिवाली की रोशनी में बैठे बैठे में एक गहरे शून्य में खो गया और एक गोताखोर कि भांति उन बिछड़े, टूटे, गिरे, मरे और वे लोग जिनका में रिणी हूं और अपनी जिम्मेदारियां उनके प्रति नहीं निभा पा रहा उन सबका स्मरण करने के लिए यादों के समंदर में कूद गया। वहां मुझे व...