मौसमी मिजाज
वक्त का ये सितम कैसा है कि मौसम ठंडा है और हसरतें गरम, यूं मुंह क्या बना रही हो बात को समझो ना बेरहम। यूं गुस्से में हरदम क्या रहती हो किस बात का है तुमको भरम? कौनसा हम तुमसे तुम्हारा शहर मांगते हैं, दो नज़र मुस्कुराकर देखो, इतने में ही खुद को लुटा देंगे हम। तुम्हारे चेहरे पे लिखी हुई कुछ तहरीरें पड़नी हैं, हाथ में हाथ लेकर बड़ी बड़ी बातें करनी हैं। छोड़ो कब तक शर्माओगे, इन बातें से कब तक जी चुराओगे। एक दिन रात की तरह ढल जाएगा ये हुस्न और तुम बस पछताओगे। एक कड़क चाय बनाओ पारले जी के साथ पिएंगे, थोड़ा सा सुकून और थोड़ी सी नोक - झोंक। कुछ रोना धोना कुछ हंस बोलेंगे, एक नए जीवन का दरवाजा खोलेंगे। वक्त सभी का एक दिन खत्म हो जाएगा, क्या पता कब किस का नसीब सो जाएगा। आज को जी क्यूं नहीं लेती, कल का कल देखा जाएगा।। प्रवीन ठाकुर