वे महबूब ए वतन थे, अपना इश्क निभा कर चले गए.
वे महबूब ए वतन थे, अपना इश्क निभा कर चले गए. देश की लाज बचाकर, मिट्टी का कर्ज चुकाकर। मेहंदी लगे हाथों से नजरें चुराकर। राखी के बंधन से कलाई छुड़ाकर चले गए. इतराता हिमालय अपनी ऊंचाइयों पर । साहस और जज्बे से उसको रौंद कर चले गए वे बहबूब ए वतन थे लहू से इतिहास लिख कर चले गए। उनके भी आंगन में बुलबुल सी चहचाहती एक चिड़िया थी। जिसकी मधुर आवाज वे बिना सुने ही चले गए। बूढ़ी मां कितनी उतावली थी, बेटे के सर पे सेहरा होगा। पत्थर दिल थे, बूढ़ी मां को भी रुलाकर चले गए। शहर में इश्क का मौसम था, इक फूल कुमारी को जल्द आने की कह कर गए थे, वो महबूब ए वतन थे । उस अभागी का दिल दुखाकर भी बड़े रौब से चले गए। तुम ईश्वर को फूल और पत्तियां चढ़ाकर, यश और वैभव की चाह रखते हो भारत मां के भक्त शीश चढ़ाकर, बिन मुराद मांगे ही चले गए। चंद रोटियां ज्यादा खाकर तुम्हें बल का मद चढ़ जाता है। सिंघों को भी मूंछ में ताव देकर छेड़ देने वाले, वीरता क्या होती है वीरों को दिखाकर चले गए। वीरों के उसूल होते हैं,...