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Showing posts from February, 2019

वे महबूब ए वतन थे, अपना इश्क निभा कर चले गए.

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वे  महबूब ए  वतन थे, अपना इश्क निभा कर चले गए.  देश की लाज बचाकर, मिट्टी का कर्ज चुकाकर। मेहंदी लगे हाथों से नजरें चुराकर। राखी के बंधन से कलाई छुड़ाकर चले गए.  इतराता हिमालय अपनी ऊंचाइयों पर । साहस और जज्बे से उसको रौंद कर चले गए वे बहबूब ए वतन थे लहू से इतिहास लिख कर चले गए। उनके भी आंगन में बुलबुल सी चहचाहती एक चिड़िया थी। जिसकी मधुर आवाज वे बिना सुने ही चले गए। बूढ़ी मां कितनी उतावली थी, बेटे के सर पे सेहरा होगा। पत्थर दिल थे, बूढ़ी मां को भी रुलाकर चले गए। शहर में इश्क का मौसम था, इक फूल कुमारी को जल्द आने की कह कर गए थे, वो महबूब ए वतन थे । उस अभागी का दिल दुखाकर भी बड़े रौब से चले गए। तुम ईश्वर को फूल और पत्तियां चढ़ाकर, यश और वैभव की चाह रखते हो भारत मां के भक्त शीश चढ़ाकर, बिन मुराद मांगे ही चले गए। चंद रोटियां ज्यादा खाकर तुम्हें  बल का मद चढ़ जाता है। सिंघों को भी मूंछ में ताव देकर छेड़ देने वाले, वीरता क्या होती है  वीरों को दिखाकर चले गए। वीरों के उसूल होते हैं,...

मैं खुद को इश्क का फरहाद समझता था।

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मैं खुद को इश्क का फरहाद  समझता था, तेरे सामने खुद को पाकर कुछ लब्ज न जोड़ पाया। गुफ्तगू करने की फिराक मैं था मैं, ये इल्म ना रहा कि हुस्ने नूर को सलाम भी न कर पाया। शहरे इश्क आगरा ने सिखा कर भेजा था, कि कैसे इजहारे इश्क होता है। मुफलिसी के दिन थे मैं ख़्वाबों का ताजमहल ना बना पाया।। अभी भी आस है कि ये मुफलिसी हट जाए, काली रातों को नूर गटक जाए। तू जो तशरीफ हमारी मिलखियत में लाए, क्या खबर कि ये तोमर नया फरहाद बन जाए। लफ़्ज़ों का फन तो गंगा जमुनी तहजीब ने सिखाया है, हर्फ दर हर्फ इजहारे काबिल बनाया है। बड़ा गुरूर था हमें इस तालीम का, शायद हमारा गुरूर तोड़ने के लिए ही खुदा ने तुझे बनाया है। गलतफहमियों का अंबार लगा लेते हैं, कुछ शख्स इश्क का अंदाज लगा लेते हैं। होश नहीं रहता दुनियां जहां का जब वो मुस्कुराकर पास से गुजर जाती है। पता नहीं कैसे ये अमन के दुश्मन इश्क मैं मजहब अडा देते हैं। जिसको भी गुरूर हो अपनी होशियारी और बहादुरी का ऐलान ए जमूरियत है कि वो मैदान ए इश्क मैं आए। यहां जंग जीतने के लिए अस्ले की दरकार नहीं है, कभी क...

तू उस पार रहती है मैं इस पार रहता हूं।

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तू उस पार रहती है, मैं इस पार रहता हूं। तू पंखुड़ी गुलाब सी है, मैं तेरी प्यास में प्यासे भंवरे सा हूं। तू हंसे तो मन्हूसियत भी खिलखिला उठती है, मैं हंसदुं तो खुद में मजाक जैसा हुं। तू उस पार रहती है, मैं इस पार रहता हूं। वक्त के थपेड़ों से भरभराया सा में, एक कलाकार की तराशी हुई सी हुस्न कि प्रतिमा है तू। तू उजालों में मस्त में अंधेरों में मगन रहता हूं। तू उस पार रहती है, मैं इस पार रहता हूं। सुबह, दिन और शाम में यही सोचता हूं। कभी तो ज्वार आयेगा इस नदी में और तू बह चली आएगी मेरे आगोश में। तू भी अपनी आंखें बंद करले और में भी ना रहूं होश में । उस पार मेरा आना जाना हो जाए इस पार तेरी खुशबू महके। और ये तोमर मुस्कुराके के बोले उस पार मेरी बस्ती है।  इस पार तेरा ठिकाना है।। तू उस पार रहती है, मैं इस पार रहता हूं। हमारे मिलन का चर्चा  कुछ यूं करें लोग, तू तरकारी में हल्के नमक सी है और में हरे धनिए की खुशबू सा हूं। तू मिठास सी। में हल्का सा चटकरा हूं।। ना तेरे वजूद की खबर, ना तेरे नाम जनता हुं। बस ये एक एहसास है, इस एहसास को...