हर दम परेशान
तीन बजकर सोलह मिनट पर लिखना शुरू कर रहा हूं। नींद ने मेरे दरवाजे पर आना छोड़ दिया है, मिथ्याभिमान सामाजिक कर्क रोग जैसा है। आपको लगता है आप बड़े ही अच्छे व्यक्ति हैं, आपका दिल तो दूसरों की सहायता को ही फड़फड़ाता रहता है, आप को तो जिंदगी के वो अनुभव हो रहे हैं जिनकी पहुंच से शायद आम आदमी तो मीलों दूर होगा, आप खुद को इतना महान समझने लगते हैं कि खुद की सुविधाओं के लिए आप अपनी नाक के नीचे बह रहे किसी के खून का इशारा भी नहीं पाते। अपराधी होते हुए भी जब हम खुद को पीड़ित समझने लगें क्यूंकि आपके पास तो एक दिल है जो हमेशा दूसरों के लिए धड़कता है, आपको तो पूरी मानवता की चिंता है, जब व्यक्ति ज्ञान की खोज करते करते विमूढ़ हो जाता है तो इस प्रकार की घटनाएं शायद उसके आम जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। समझने लायक भाषा में कहूं तो आदमी चतुर बनते बनते चूतिया बन जाता है तो उसे लगने लगता है कि वही पीड़ित है, उसके साथ हुआ गलत गलत है उसने किन परिधियों को लांघकर किसको किस आग में झोंक दिया उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। समय के नियम ही ऐसे नखरिले हैं कि केवल मुर्दा ही एक समान रह सकता है, अंग्रेजी की एक कहाव...