मेरी प्रेमिका कहां है?
रात के ढाई बज गए अब तो शायद सारी उम्मीदें भी किसी एक नई उम्मीद के जागने की उम्मीद में सो चुकी हैं। जिंदगी कहां से बह रही है और कहां रुकेगी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, हर चीज से मुंह फेर लेने की जैसे आदत सी हो गई है। इंस्टेंट दुनियां में जैसे फिट नहीं बैठ पा रहा हूं, कभी कभी लगता है इस अकेलेपन से निजात पाने के लिए किसी बंधन में बंध लूं। पर इस बुलेट ट्रेन से तेज भागती दुनियां में श्रीकांत की प्यारी कहां इंतजार करेगी, या फिर विनय सिंह की सोफिया जो प्रेम के परम होने को समझे। फूहड़ता के जमाने में मैं गजलों और गांव के तरानों का स्वाद लेता हूं, वन नाइट स्टैंड और ब्लाइंड डेट के जमाने में मुंशी जी और सरथ बाबू जी के उपन्यासों की प्रेमिका खोजता ये मेरा मन दो समय के अंतरालों में फंसकर रह गया है। जब भी जीवन में कुछ अच्छा होने लगता है तो अंदर बैठे कहानीकार को लगता है कि उसकी मृत्यु के दिन निकट आ गए इसलिए सारी खुशियां अपनी बर्बाद कर लेता हूं। पर इस सोसल मीडिया की दुनियां में सालों का सफर तय करके बनी एक कहानी को पढ़ने का समय किसके पास है? 4 साल से श्री लेखा से रोज मिन्नतें करता हूं, पर श्र...