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शारदा नंदन।

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  है कलरव चिड़ियों का, झरनों की है आवाज। मन जोर से पहाड़ की चोटी को देखकर चीखना चाहता है, "महादेव!!!" "शंभू" "शंकरा". एक यात्रा है जो मैं कभी खत्म करना नहीं चाहता, एक समय है जो एक दिन मुझे खत्म कर देगा। एक मोक्ष समान अवस्था है, एक इच्छा है कि तीस किलो के बैग को पचास किलो का कर लेता हूं, बहुत सारे कपड़े लेकर घूमने के बजाय दो भगवा शॉल लेता हूं, टेंट जो खरीदा था वो साथ लेता हूं और खाना बनाने का सामान, फिर निकल पड़ता हूं, अपने जीवन के बोनस के दिनों का आनंद लेने, दिव्यता को समेटने, असीम, अनंत, संभावनाओं को आत्मसात करने। शंकरी, झरकटी और कंकड़ पत्थरों के रास्तों में अकेले - अकेले चलने का आनंद, साथ में चलने योग्य साथी न होने का दुख नीचे छोड़कर में ऊपर चढ़ता जा रहा हूं, नीचे एक अलीगढ़ का लड़का अपने दोस्त से मिन्नतें कर रहा है, "भाई बस चार सौ मीटर दूर है" मेरे चेहरे पर मुस्कान जैसे स्थाई होती जा रही है, जबरदस्ती का साथी खींचने के बजाय अकेले चढ़ जाओ, जहां बैठना चाहो बैठ जाओ, जहां से लौटना चाहो लौट जाओ, जहां अकेले बैठकर सोचना चाहो सोचो, विचारो और फटकार मारते...

कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय।

 कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय। तीन टीशर्ट, तीन पैंट और एक शर्ट रखके आज से एक महीने नौ दिन पहले घर से निकला था साथ में एक स्वीट शर्ट और हुडी रखी थी क्यों कि पहाड़ों का पहले से सोचकर ही निकला था। इतने दिन हो गए अलग अलग शहरों की हवा लगे, कि अब वापस लौटा नहीं जा रहा है, एक दिन सोच रहा था कहां जाऊं लौटकर हर जगह तो पूर्ण विराम लगा आया हूं, लौटने का ठिकाना कहीं छोड़ा हो तो जाया जाए।  दिल्ली दंगों के समय जब नाले में से हाथ बांधे एक लाश को निकाला गया था तब मेरे शरीर में कंपन्न होने लगा था और आवेश में मैंने कहा था कि मैं संन्यासी होकर कर्म करूंगा, वो केवल आवेश ही था, क्योंकि संन्यासी होना क्या होना होता है मैं नहीं जानता था। अगर केवल कपड़े और कपड़ों का स्टाइल बदल देने मात्र को संन्यासी होना कहते तो ये तो बिलकुल मिथ्याचार है सन्यास के नाम पर। घूमते - घूमते, सड़कों पर दुकानों पर ट्रेन के डब्बों में पहाड़ों में, बारिशों में हर जगह मैं देखने लगा क्या कोई प्रश्न अब बाकी रह गया है? तो मन खाली सा हो जाता, फिर प्रश्न करता तो क्या सारा देख लिया है, सब कुछ अनुभव कर लिया है? उत्तर आता नहीं...

समय से मार खाया इतिहास

  अंधकार के पीछे मोमबत्ती लेकर चलता हुआ मनुष्य समझता है कि संसार को राह दिखाने का ठेकेदार वही है, उसके पीछे चल रही भीड़ उसके निर्देशों पर चलेगी, और काट देगी समय की तारीखों के गले, ऐसी गलतफहमियां पालकर मानव जाति को तंग करता हुआ व्यक्ति एक दिन हदें पार कर देता है, सारी मानवीय करुणाओं को ताक पर रखकर उजाड़ना शुरू कर देता है बने बनाए और सजे सजाए घरों को। पर वो भूल जाता है कि समय का एक सूर्य भी है, जिसकी रोशनी चीर देती है उस राह भटके हुए व्यक्ति को जो अपना महत्व आवश्यकता से अधिक समझ लेता है। आज बात करेंगे उन तुच्छ इतिहासकारों की जिन्होंने अपने आप को सास्वत समझने की भूल करी पर खुशनसीब हैं ये इतिहासकार कि इनके जीवित रहते ही इनकी गढ़ी गई गाढ़ी गंध मारती इतिहास की सड़ी- सड़ाई शिक्षा अब इनके मुंह पर ही चुपड़ी जा रही है। दरअसल इतिहास एक ऐसा शब्द है जिससे छेड़छाड़ मनुष्य ने कई बार करने की कोशिश करी, जाने कितने इतिहास धरती में गढ़े हुए मिले, इतिहास तो जमीन खोदकर फिर से वट का विशाल वृक्ष बनकर निकल आता है, पर मर जाते हैं उस इतिहास को छुपाकर दुनियां जितने की कोशिश करने वाले लालची और अहंकारी लोग...

सड़क का बेकार पत्थर।

 पास रहकर, आंखों में देखकर, शरीर को छूकर और वो सब करके जो दुनियां करवाना चाहती है तो भी सुकून न मिले तो याद रखना मेरे कंधे तैयार हैं तुम्हारे आंसू सोखने के लिए। मैं तुम्हें कभी रोने न देने का वादा नहीं करूंगा क्योंकि मैंने रोने में जो सुख देखा है, जो शांति महसूस की है, जो शुद्ध हो जाना, जाना है, मैं नहीं चाहता उस सुंदरता को तुम जी न पाओ। दुनियां की फरमाइशें और मन की ख्वाहिशें दोनों में से एक पूरा होगा, मुझे तुम पूरा कर दो तुम्हें में अपने आप से भर दूंगा।  मैं एक सड़क पर पड़े हुए बेकार पत्थर सा हूं, तुम मुझे उठा ले जाओ और रख दो अपने घर के मंदिर में मेरे सर पर अपने प्रेम की लाल चुन्नी उड़ाकर। अपने होठों की लाली से चूमकर ठीक मस्तिष्क पर बना देना एक लाल निशान। तुम्हारे बस इतने से साथ से मैं दुनियां के लिए पूजनीय हो जाऊंगा। और मेरी सारी पूजा अर्पण होगी तुम्हारे प्रेम के उस सागर में जिसने मुझे सड़क पर पड़ती ठोकरों से बचाकर मानवों की श्रद्धा में बिठा दिया। लेखक - प्रवीन ठाकुर

ट्रेन के सफर में मैं जिंदा होता हूं ...

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  कल रात को ट्रेन में बैठा तो साइड लोवर बर्थ था, बगल की सीटों पर बस दो लड़कियां बैठी थीं शायद दोनों बहन, लड़की देखकर जाने कौनसे दिमाग के कीड़े को तमीज आ जाती है कि हर जगह सही इंप्रेशन देना चाहता है। वैसे मैं खाली खिड़की के पास बैठा कान में इयरफोन डाले गीत सुन रहा होता हूं, वीडियो देख रहा होता हूं, खिड़की से बाहर देख रहा होता हूं। लेकिन जब भी आसपास लड़की हो तो मैं थोड़ा बेहतर वर्जन होना चाहता हूं अपने आप का और कल रात मैंने पेन पेपर निकालकर लिखना शुरू किया और बस जिंदगी के कुछ प्रोडक्टिव तीन घंटे, तीन घंटे में तीन गीत!! सफर वैसे रात ग्यारह बजे से सुबह पांच बजे तक का था पर फिर  मैं सो गया। अब इस पोस्ट के माने क्या निकाले जाएंगे मुझे नहीं पता  मुझे बस इतना पता लगा है कि आसपास थोड़ा परफॉर्मेंस प्रेसर होना चाहिए।  किसी के पास इतनी हिम्मत और टाइम नहीं है कि वो आपको जज करे और बोले कि जिंदगी में स्क्रोल करना ही तेरा मकसद नहीं हो सकता। आपको अपनी वजह खुद तलाशनी होंगी। जब भी कुछ ऐतिहासिक घटित होता है, जैसे कल नीरज सर ने भाला कोंच दिया और पूरे हिंदुस्तान में करियर क्या चुनना है जै...

केरल

 केरल के बारे में वीडियो बनाते समय ये विचार था कि लोग अवश्य ही इसमें कुछ ऐसा खोजेंगे जिससे उन्हें लगेगा कि ये शायद केरल का महिमा मंडन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है हैरत इस बात की है कि इनमें से लाखों लोगों ने केरल में जिहाद, कैनवर्जन और अन्य तरह की नकारात्मक खबरों को रसपान की तरह ग्रहण कर लिया था पर आज यहां व्यवहार करके इनसे मिल जुल्के जो जानकारी मिली है वो पच क्यों नहीं रही? - मैंने पूरी कोशिश की कि केवल उन्हीं बातों का मेंशन करूं जिससे अतिशयोक्ति न लगे कुछ बातें मैंने छोड़ दी थीं जैसे - बुराई  १ ट्रांसपोर्ट बहुत महंगा है ओला उबर के साथ साथ नॉर्मल ऑटो वाले भी सौ दो सौ से कम में बात नहीं करते और यहां दिल्ली और अन्य राज्यों की तरह लादकर दस दस रुपए वाले शेयरिंग ऑटो नहीं चलते एर्नाकुलम में बाकी के जिलों में डाउट है लेकिन सरकारी ट्रांसपोर्ट बहुत सस्ता और अच्छा है। इसके अतिरिक्त अभी बुराई नहीं मिली हिंदी के प्रति लोगों के जटिल रवैया को बुराई नहीं मानता हिंदी भाषी भी आए दिन अंग्रेजी को कोसते हैं तो इनका भी स्वाभाविक है। १ - कूड़े के प्रति केरल के बच्चे बच्चे की सजगता, गीला कूड़ा, सूख...

मेरी प्रेमिका कहां है?

 रात के ढाई बज गए अब तो शायद सारी उम्मीदें भी किसी एक नई उम्मीद के जागने की उम्मीद में सो चुकी हैं। जिंदगी कहां से बह रही है और कहां रुकेगी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, हर चीज से मुंह फेर लेने की जैसे आदत सी हो गई है। इंस्टेंट दुनियां में जैसे फिट नहीं बैठ पा रहा हूं, कभी कभी लगता है इस अकेलेपन से निजात पाने के लिए किसी बंधन में बंध लूं। पर इस बुलेट ट्रेन से तेज भागती दुनियां में श्रीकांत की प्यारी कहां इंतजार करेगी, या फिर विनय सिंह की सोफिया जो प्रेम के परम होने को समझे। फूहड़ता के जमाने में मैं गजलों और गांव के तरानों का स्वाद लेता हूं, वन नाइट स्टैंड और ब्लाइंड डेट के जमाने में मुंशी जी और सरथ बाबू जी के उपन्यासों की प्रेमिका खोजता ये मेरा मन दो समय के अंतरालों में फंसकर रह गया है। जब भी जीवन में कुछ अच्छा होने लगता है तो अंदर बैठे कहानीकार को लगता है कि उसकी मृत्यु के दिन निकट आ गए इसलिए सारी खुशियां अपनी बर्बाद कर लेता हूं। पर इस सोसल मीडिया की दुनियां में सालों का सफर तय करके बनी एक कहानी को पढ़ने का समय किसके पास है? 4 साल से श्री लेखा से रोज मिन्नतें करता हूं, पर श्र...