लोक डाउन में शहर खाली हो गया।
आस पड़ोस के उत्तराखंड, बिहार यूपी वाले सब धीरे धीरे निकल गए पूरे एरिया में बस कुछ मुझ जैसे या दो चार दुकानदार और मकान मालिक जो यहीं के हैं वो रह गए हैं। ढाई साल में पहली बार इस शहर में अजीब सा लग रहा है जहां दो किलोमीटर ऑफिस जाने में पैदल जाओ तो दस मिनट लगते थे ऑटो से जाओ तो ट्रैफिक की वजह से एक घंटा, आज दो किलोमीटर तक तो छत पर खड़े होकर सुनसान दिख रहा है। धीरे धीरे सब गांव जा रहे हैं। परमात्मा जो भी कर रहा है कुछ अच्छे के लिए ही कर रहा होगा। गोबर फेंकने की जितनी जगह थी उतने बड़े कमरे में लोग यहां रहते हैं अब शायद सोना उगलती जमीन का दाम उन्हें समझ आया होगा। गांव में पिछली बार जब गया था तो एक क्रिकेट टीम जितने ग्यारह लड़के भी खेलने के लिए इकठ्ठे नहीं हो पाए थे, आबादी बढ़ भी रही है तो शहर में, गांव तो उजड़ते जा रहे हैं अब शायद उनको समझ आएगा जब कोई शहरी "गंवार" कहता है तो वो गाली नहीं जलन होती है उसकी, वो पाउच का दूध पीने वाला क्या जाने गांव क्या होता है। देहाती और गंवार का मतलब अनपढ़ और जाहिल नहीं है और ना ही वो उन पढ़े लिखे जाहिलो की बराबरी कर सकते जो धरती का...