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Showing posts from June, 2020

लोक डाउन में शहर खाली हो गया।

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आस पड़ोस के उत्तराखंड, बिहार यूपी वाले सब धीरे धीरे निकल गए पूरे एरिया में बस कुछ मुझ जैसे या दो चार दुकानदार और मकान मालिक जो यहीं के हैं वो रह गए हैं। ढाई साल में पहली बार इस शहर में अजीब सा लग रहा है जहां दो किलोमीटर ऑफिस जाने में पैदल जाओ तो दस मिनट लगते थे ऑटो से जाओ तो ट्रैफिक की वजह से एक घंटा, आज दो किलोमीटर तक तो छत पर खड़े होकर सुनसान दिख रहा है। धीरे धीरे सब गांव जा रहे हैं। परमात्मा जो भी कर रहा है कुछ अच्छे के लिए ही कर रहा होगा। गोबर फेंकने की जितनी जगह थी उतने बड़े कमरे में लोग यहां रहते हैं अब शायद सोना उगलती जमीन का दाम उन्हें समझ आया होगा। गांव में पिछली बार जब गया था तो एक क्रिकेट टीम जितने ग्यारह लड़के भी खेलने के लिए इकठ्ठे नहीं हो पाए थे, आबादी बढ़ भी रही है तो शहर में, गांव तो उजड़ते जा रहे हैं अब शायद उनको समझ आएगा जब कोई शहरी "गंवार"  कहता है तो वो गाली नहीं जलन होती है उसकी, वो पाउच का दूध पीने वाला क्या जाने गांव क्या होता है। देहाती और गंवार का मतलब अनपढ़ और जाहिल नहीं है और ना ही वो उन पढ़े लिखे जाहिलो की बराबरी कर सकते जो धरती का...

धार्मिक उन्माद।

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                      धार्मिक उन्माद। धार्मिक उन्माद नोट - इस लेख को दो बार पढ़ें अगर समझ न आए तो। कई दिन लग गए खुद को वापस नॉर्मल करने में, मस्तिष्क को मैंने नफरत का पावर हाउस बना लिया था। जिन प्रभावों में आया था और जिस अपनेपन से उन विचारों को मैंने ग्रहण किया था उससे व्यक्ति की सामान्य सोचने समझने की क्षमता भी क्षीण हो जाती है। धार्मिक उन्माद है क्या - तो ये कोई समाधान नहीं केवल एक ब्लेम गेम है जिसमें आप केवल आरोप प्रत्यारोप करते हैं एक दूसरे पर। आपकी मान्यता सही होती है और दूसरे की गलत। यहां तक कि भाषा को भी एक धर्म से जोडा जाता है  कुछ निरे मूर्ख उर्दू शब्दों तक के प्रयोग पर झुलस जाते हैं तो कुछ अंग्रेजी में हिन्दी और संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने की बात करते हैं। जबकि भाषा का सम्बन्ध रीति रिवाज रहन सहन से हो सकता है पर भगवान के सम्बन्ध में भाषा का कोई महत्व नहीं वहां तो रिश्ता ही दिल का होता है। आप एक खास वर्ग को ही हर समस्या की जड़ मानने लगते हैं। अच्छे में अच्छाई आपको नहीं दिखती पर बुराई आप चुन चुन ...