पुरानी यादों के कुछ दस्तावेज
#An_open_letter_to_all_my_relatives_familymembers_and_friends
इस दिवाली मुझे मेरे स्वर्गीय नाना जी का बर्फी के प्रति प्रेम याद आया।
ये स्मृति तो सामान्य सी थी या यूं कहिए दिवाली की सफाई में मेरे शरीर का CPU शायद उस फोल्डर को डिलीट कर रहा था जहां कुछ धुंधली सी पड़ी हुई फाइलें करप्ट हो गई थीं और शायद में अपने हाथ रखकर रिफ्रेश न करता तो मुझे इस आत्मीय आनंद का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।
हर व्यक्ति का जीवन एक कृक्षेत्र है और वह व्यक्ति उस कृक्षेत्र का अर्जुन जिसकी व्यथा नारायण भी नहीं समझ सके और अर्जुन को समझाया कि वीर पुरुष यूं विसाद में डूबा नहीं करते।
पर हे ऋषिकेश मानव सरंचना में दिमाग और दिल भी तो आप ही की देन हैं ना और अपनों के प्रति अपार मोह भी तो आप बाल्यकाल से ही निशुल्क उपहार में देते हो।
इन्हीं सोच में पड़कर दिवाली की रोशनी में बैठे बैठे में एक गहरे शून्य में खो गया और एक गोताखोर कि भांति उन बिछड़े, टूटे, गिरे, मरे और वे लोग जिनका में रिणी हूं और अपनी जिम्मेदारियां उनके प्रति नहीं निभा पा रहा उन सबका स्मरण करने के लिए यादों के समंदर में कूद गया।
वहां मुझे वो स्टमपर की नीली गेंद भी मिली जो नानी ने मुझे दिलाई थी वो अभी भी ऐसे उछल रही थी जैसे किसी नन्हे बालक को मुस्कुराता देख व्यक्ति खुद को हवा सा हल्का महसूस करने लगता है मैने उसको पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो मुझे चिढ़ा कर चली गई और मुफ्त की सलाह में कहती गई वक्त लौटकर नहीं आता मेरे लाडले।
आगे चला तो वो बहुत से पेन जो अपने छोटे मामा के कमरे से चुराए थे वह पड़े मिले वे स्याही के खून में नहा रहे थे और आंखों में पानी लिए मेरी तरफ दया की दृष्टि से देख रहे थे मानो कह रहे हैं कि एक बार फिर से अपने हाथों में थामकर एक बार उस छोटे से ज्योमेट्री बॉक्स को सजाओ ना जिसे तुम जंग लगा छोड़ कर चले गए हो।
मैने उन पेनो को नज़र भर देखा और उनको बताया कि अब कम्प्यूटर का जमाना है मुझे तुम्हारी जरूरत तो नहीं पर फिर भी मेरी स्मृतियों में काफी जगह खाली होगई है तुम भी किसी कोने में चुपचाप पड़े रहना।
यादें बहुत थीं और रात छोटी इसलिए में जल्दी से आगे बढ़ा तो मेरे स्वर्गीय मौसा जी की वो छोटी सी काले रंग की कार जिसकी खिड़की ऑटोमैटिक खुलती थी जो मुझे उन्होंने सांवले के घर बिहारी जी के मंदिर की यात्रा के समय दिलवाई थी वहीं रेंगती हुई मिली में अचंभित था कि इसकी बैटरी खर्च नहीं हुई तो उसने मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा में अब सिर्फ यादों में चलती हूं मेरे तो शरीर के टुकड़े भी कहीं वास्तविकता में नहीं हैं।
मेरे पास उसकी व्यथा सुनने की शक्ति नहीं थी और में वहां से पीठ दिखाकर भाग खड़ा हुआ।
बड़े मामा की वो लाल स्पलेंडर जिसपे बैठकर कभी उनके साथ स्कूल गया वो भी वहीं टहल रही थी पर शायद वो अपने टूटे हुए शरीर के चीथड़े लेकर अपने अंतिम समय के द्वार तक जा रही थी।
बचपन में स्कूल में सभी को अंताक्षरी में हराने के लिए अपने पिताजी को रात रात भर जगाकर एक कॉपी में जो गाने लिखे थे वो डायरी का एक एक पन्ना अभी भी हवाओं में घूम घूम कर तराने गुन गुना कर मेरी यादों को आवाज दे रहा था।
कमाल की बात ये थीं मुझे कुछ भी ऐसा याद नहीं आ रहा था जिससे मुझे कष्ट हुए थे ये सिर्फ मीठी यादों का उपहार शायद स्वयं नारायणी लक्ष्मी दे रहीं थीं मेरा वैराग्य भंग करने को।
सर्दियों की वो धूप में आंघन में जो खाट पड़ी थी वहां उस कुत्ते की आत्मा बैठी थी जो सिर्फ मुझे देखकर भौंकता था और मेरी दोनों छोटी मौसियां मेरे कुत्ते से डरने पर बड़ा हंसती थीं वहां कुछ संतरे की गोलियां जो सुनीता मौसी मुझे दिलाके लाई थी वहीं पड़ी थीं और चींटियों ने उनमें छेद कर दिए थे।
और आगे बढ़ा तो छोटे नाना नानी के आंगन में वो बल्ला और गेंद उदास बैठे थे जिनसे कभी में छोटू मामा और मनोज मामा आकाश के साथ खेले थे।
वहां ऐसे बहुत सारे लोगों की स्मृतियां थीं जिनके नाम मेरी स्मृतियों से मिट चुके हैं शायद पिछली दिवाली को इन यादों को छुआ नहीं और ये मिट गईं।
मैने मिटी हुई यादों को किनारे कर दिया और थोड़ा आगे बढ़ा तो बुआ के आंगन में गढ़े दो लकड़ी के खंभों के ऊपर पड़ी मिट्टी की छत के खरोंदे में बैठी गलगलिया चहचहाने लगी
गलगलिया मेरी और कृष्णा के झगड़े की वजह से परेशान थी और कह रही थी इस घर के लोग मेरी जिंदगी में शांति नहीं आने देते तभी मेरा कृष्णा से एक और युद्ध हुआ क्योंकि मैने रोटी की ऊपर की पपड़ी लेकर नीचे की मोटी रोटी उसकी थाली में रखदी और वो रोने लगी तो हमेशा की तरह फूफा कृष्णा की तरफ होगए और बुआ ने मुझे गोद में भर लिया गालगलिया टेंशन में आके उड गई।
उड़ती हुई गलगालिया के पीछे पीछे में अपने गांव हकिमपुरा चला गया वहां यादें इतनी झुंड में थीं कि उनका शोर सुनके मेरे सर में दर्द होने लगा वो खेत, गलियां और वो चबूतरे जहां खेल दिखाने वाला आता था अब वहां सिर्फ सूखी पत्तियों का कूड़ा पड़ा था।
वो खुला हुआ बड़े आंगन का घर मेरे स्पर्श के लिए रो रहा था वो भैंस भी जिसके माथे पे हाथ फेर कर चारा डालता था मुझे देखते ही पानी मांगने लगी मानो जबसे में गया हूं वो निशब्द जीव प्यासा ही खड़ा हो।
बहुत से चाचा, ताऊ, बाबा और चचेरे मचेरे भाई बहन मेरे मुंह पे लानत दे रहे थे कि में उन्हें याद भी नहीं करता।
मेरी हालत नाजुक हो गई थी 9 वर्ष की इतनी यादें एक साथ आयी तो में सामना नहीं कर पाया और खुद को नारायणी की शरण कर दिया।
नारायणी ने मुझ पर दया की और उन यादों की पीक्चर को बीच में ही बंद कर दिया ।
बुआ फूफा, नाना नानी, मौसा मौसी, मामा मामी, भाई बहन पापा और वे सभी लोग जो मेरे जीवन के सफ़र में चले और चल रहे हैं उन सभी के लिए में लक्ष्मी से शांति की प्रार्थना करता हूं और ये कामना करता हूं कि आप हमेशा खुशियों में इतना व्यस्त हो जाओ कि मेरी याद आपको कभी न आए ।
में अपनी जिम्मेदारी आपके प्रति नहीं निभा पा रहा उसके लिए मुझे माफ कर दीजिएगा, वक्त मुझे जिस डंडे से खदेड़ रहा है वो मुझे पीछे मुड़ने कि इजाजत नहीं दे रहा और नहीं रुक कर आराम करने दे रहा है।
अपने सभी जो मेरा साथ छोड़ चुके हैं या किसी भी मुसीबतों से गुजर रहे हैं उनकी सुख शांति के लिए इस बार लक्ष्मी की पूजा में मैंने क्रपा दृष्टि मांगी है।
कंपनी के गरीब मजदूर जो अपने परिवार को चीनी मयस्सर नहीं करा पाते और दिवाली कि छुट्टी न मिलने के कारण घर भी नहीं जा पाए उनको नाना जी की और उन सभी अपनों की याद में बर्फी के डब्बे दे कर आप सभी के लिए प्रार्थनाएं मांगी है इन प्रार्थनाओं की धूप की सुगंध और स्नेह आप तक पहुंचे तो स्वीकार कर लीजिएगा और मुझे क्षमा कर अपने जीवन में व्यस्त जो जाइएगा ।
आपसे बस यही आशा है कि आप सब बेमतलब कि फिजूल की आपसी नोकझोंक छोड़कर आपस में प्रेम से रहिए वरना किसी दिन आपकी यादों की गेंद भी आपके हाथ नहीं आयेगी और आप की यादें आपको इसकी सजा देंगी उस वक्त आपके हाथ में उन यादों को मिटाने के लिए कुछ नहीं होगा आपको उसी कड़वे जहर के साथ रहना पड़ेगा।
आपका प्रवीन

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