हर दम परेशान

 तीन बजकर सोलह मिनट पर लिखना शुरू कर रहा हूं।


नींद ने मेरे दरवाजे पर आना छोड़ दिया है, मिथ्याभिमान सामाजिक कर्क रोग जैसा है। आपको लगता है आप बड़े ही अच्छे व्यक्ति हैं, आपका दिल तो दूसरों की सहायता को ही फड़फड़ाता रहता है, आप को तो जिंदगी के वो अनुभव हो रहे हैं जिनकी पहुंच से शायद आम आदमी तो मीलों दूर होगा, आप खुद को इतना महान समझने लगते हैं कि खुद की सुविधाओं के लिए आप अपनी नाक के नीचे बह रहे किसी के खून का इशारा भी नहीं पाते।

अपराधी होते हुए भी जब हम खुद को पीड़ित समझने लगें क्यूंकि आपके पास तो एक दिल है जो हमेशा दूसरों के लिए धड़कता है, आपको तो पूरी मानवता की चिंता है, जब व्यक्ति ज्ञान की खोज करते करते विमूढ़ हो जाता है तो इस प्रकार की घटनाएं शायद उसके आम जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। समझने लायक भाषा में कहूं तो आदमी चतुर बनते बनते चूतिया बन जाता है तो उसे लगने लगता है कि वही पीड़ित है, उसके साथ हुआ गलत गलत है उसने किन परिधियों को लांघकर किसको किस आग में झोंक दिया उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

समय के नियम ही ऐसे नखरिले हैं कि केवल मुर्दा ही एक समान रह सकता है, अंग्रेजी की एक कहावत है; Only dead fish go with the flow. यानी की एक मरी मछली ही पानी के बहाव के साथ बह सकती है। पर महाज्ञानी हो चुके लोगों पर समय के किसी नियम और सिद्धांत का असर नहीं होता वो जड़ता से जड़ पकड़ कर ही बैठा रहता है और पानी के बहाव के साथ चुपचाप बहा जाता है। जिंदा व्यक्ति बहाव के साथ नहीं बल्कि आवश्यकतानुसार अपना रास्ता चुनता है, मरा मानुष ही स्थायी रह सकता है, जिसे काल और परिस्थिति के साथ बदलने का अभ्यास नहीं उसके दुखों का कारण खुद होते हुए भी वह खूब न्याय हित भाषण बाजी करके खुद को पीड़ित और असाहाय दिखा सकता है परन्तु दुख ये है कि उन्हें ये समझाए कौन ज्ञान ज्ञान करते करते तो ये विमुढ़ हो गए।

ऊपर दिया गया ज्ञान मेरे एक नए अनुभव का है, मैं अपराधी के कटघरे में खड़ा हूं। हर दलील मै मेरे पक्ष में जाती दिखा सकता हूं क्यूंकि मेरे अनुसार मेरे द्वारा किया जा रहा सही है पर वहीं ऐसे लोग भी होंगे जो साफ साफ कहेंगे कि मैं अपराधी हूं, और अब मैं बिखर रहा हूं, टूट रहा हूं, धीरे धीरे लुप्त हो रहा हूं। किसी को नहीं दिखाना कि मैं उस मार्ग का अनुसरण कर रहा हूं जो किया जाना चाहिए, मैं राक्षसी रोल निभाना स्वीकारता हूं।

अच्छे के साथ बुरा होने पर अच्छे को अपनी अच्छाई नहीं छोड़नी चाहिए पर मैंने हिसाब बराबर करने का रास्ता चुनकर भूल कर दी थी। जाने किस किस अपराध के प्रायश्चित और आजीवन मनो कारावास में गुजारने हैं।
आजीवन खुद को ऋणी कर लिया है, सारा जीवन ही यूं ही निकल जाएगा बुराई के साथ बुराई करने की सजा अब आजीवन ऋणी रहकर चुकानी पड़ेगी।

खराब सी हालत, दुखी मन, टूटा आत्मबल, सिकुड़ती मेरी आजादी कि परिधियों के बीच कुछ सांसों के गहने कर साथ जीवित रहना है, जब तक रहा जा सके।

तीन बजकर बावन मिनट हो गए ज्यादा देर फोन देखना दुखी करता है इसलिए रखता हूं, मेरा कौनसा ..... अब फिर मिलूंगा "शायद" या फिर "शायद कभी नहीं".

चार बज गए ।

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