ट्रेन के सफर में मैं जिंदा होता हूं ...
कल रात को ट्रेन में बैठा तो साइड लोवर बर्थ था,
बगल की सीटों पर बस दो लड़कियां बैठी थीं शायद दोनों बहन, लड़की देखकर जाने कौनसे दिमाग के कीड़े को तमीज आ जाती है कि हर जगह सही इंप्रेशन देना चाहता है। वैसे मैं खाली खिड़की के पास बैठा कान में इयरफोन डाले गीत सुन रहा होता हूं, वीडियो देख रहा होता हूं, खिड़की से बाहर देख रहा होता हूं। लेकिन जब भी आसपास लड़की हो तो मैं थोड़ा बेहतर वर्जन होना चाहता हूं अपने आप का और कल रात मैंने पेन पेपर निकालकर लिखना शुरू किया और बस जिंदगी के कुछ प्रोडक्टिव तीन घंटे, तीन घंटे में तीन गीत!! सफर वैसे रात ग्यारह बजे से सुबह पांच बजे तक का था पर फिर मैं सो गया।
अब इस पोस्ट के माने क्या निकाले जाएंगे मुझे नहीं पता
मुझे बस इतना पता लगा है कि आसपास थोड़ा परफॉर्मेंस प्रेसर होना चाहिए।
किसी के पास इतनी हिम्मत और टाइम नहीं है कि वो आपको जज करे और बोले कि जिंदगी में स्क्रोल करना ही तेरा मकसद नहीं हो सकता। आपको अपनी वजह खुद तलाशनी होंगी।
जब भी कुछ ऐतिहासिक घटित होता है, जैसे कल नीरज सर ने भाला कोंच दिया और पूरे हिंदुस्तान में करियर क्या चुनना है जैसे सवालों में फंसे युवाओं को एक और विकल्प दिया शानदार जबरदस्त जिंदाबाद। मुझे याद है इंडिया के वर्ल्डकप जीतने के दूसरे दिन मेरी सौतेली मां ने पहली बार कुछ खेलने की चीज लाने के लिए पैसे दिए थे और तब मैं एक बैट लेके आया था, आज भी बहुत से मां बाप ने अपने बेटे बेटियों की तरफ एक दूसरी और बेहतर नजर से देखा होगा। उस दिन एक बैट खरीदने भर से क्रिकेट में मेरा बहुत विकास हुआ था, अपनी उम्र से तीन गुना बड़े लोगों के साथ ओपनिंग पर भेजा जाता था मुझे। स्कूल के बाद सीधा नौकरी और फिर वहां एक शौक खत्म हो गया।
हिंदुस्तान जवान है लेकिन इसे पालने वाली पीढ़ी अभी भी बूढ़ी ही है, हमें हमारी हार और जीत दोनों का ही उत्सव मनाना चाहिए क्यूं कि दोनों ही हमें सरकारी नौकरी के एक मात्र लक्ष्य से और भी कुछ दिखा रही है। आपने वर्ल्ड क्लास लेंस से हिंदुस्तान को देखा होगा क्योंकि सोसल मीडिया ने आपको पूरी दुनियां से जोड़ दिया है और आप अब उसी लेवल का हिंदुस्तान चाहते हैं जो कि एक खुशी की बात है क्योंकि वैसा हिंदुस्तान आप ही बनाएंगे कम से कम आप वो बदलती पीढ़ी हैं जो अपने सपने पूरे करने के लिए तो थोड़े उम्र में इधर उधर निकल गए हैं पर आपके सपने आपसे ट्रांसफर होंगे आपकी अगली पीढ़ी में जिसे आप गीता - बबिता और बिंद्रा - चोपड़ा और ias yas या शायद कोई भूल चूक में लेखक ही बना दें। क्योंकि हमारी लेखकों की जाति की दुविधा ही अलग हैं अकड़ सम्राटों की और पकड़ *** की भी नहीं है।
अगर आप भी उन महत्वाकांक्षी लोगों में से हैं जिन्हें मेरी ही तरह किसी बड़े स्तर पर किसी व्यक्ति या टीम का इस प्रकार का शौर्य प्रदर्शन और उसके बाद करोड़ों लोगों का उनके लिए आदर भाव से भर उठना देखकर आपको अपनी जिंदगी में भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण मकसद देकर उसके प्रति लगन से काम करने का मन करता है तो मेरी तरफ से खुद को गाल पर एक चुम्मा दे लीजिएगा😚।
मैं भी कल सोच रहा था, मैंने आठ कंपनियां बदल डाली, एक शौक विडियोज बनाने का भी हुआ था वो भी देखा, और कई तरह के अलग - अलग कौशल की शिक्षा ली उसके बाद कुछ जमा तो बस लिखना, क्या मैं कभी उस स्तर तक पहुंचूंगा जहां मुझे करोड़ों लोग सराहें?
तब मुझे नीरज चोपड़ा मास्क के अंदर से राष्ट्रगान पर मुंह हिलाते दिखे, और बैक ग्राउंड में एक टेबल पर बैठे राष्ट्रगान लिखते हुए एक बंगाली भद्रजन! और बस मुझे अपनी चुनी हुई राह पर एक आवश्यकता की उम्मीद दिखी है। साहित्य में जहां शब्दों की जगह खाली हो गई है, गीतों में जहां बोल कम पड़ रहे हैं और कोला कोका ही एक मात्र गीत का बोल होता जा रहा है वहां जरूरत तो है ही और क्या चाहिए? कूट कूट के मैंने अपने मन का काम ढूंढा है अब भी कोई शक?
सरकारी नौकरी का जब भी कोई बोलता है तो मुझे चिढ़ होने लगती है। अपने स्तर के नीचे की चीज में बस इसलिए तो नहीं हाथ फैलाकर मांग लूंगा कि गांव देहात के कुछ अनपढ़ लोग सरकारी नौकरों को ही माई बाप मानते हैं। मुझे उस जगह खड़ा होना है जहां मैं खुद को सम्मान की दृष्टि से देख सकूं न कि किसी बीड़ी में बर्बाद और चाय के ठेले पर निठल्ले खांसते बीमारों की चर्चा में क्या बेहतर काम है उससे अपना काम तय करूंगा।

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