वे महबूब ए वतन थे, अपना इश्क निभा कर चले गए.

वे  महबूब ए  वतन थे,
अपना इश्क निभा कर चले गए. 

देश की लाज बचाकर, मिट्टी का कर्ज चुकाकर।
मेहंदी लगे हाथों से नजरें चुराकर।
राखी के बंधन से कलाई छुड़ाकर चले गए. 

इतराता हिमालय अपनी ऊंचाइयों पर ।
साहस और जज्बे से उसको रौंद कर चले गए
वे बहबूब ए वतन थे लहू से इतिहास लिख कर चले गए।

उनके भी आंगन में बुलबुल सी चहचाहती एक चिड़िया थी।
जिसकी मधुर आवाज वे बिना सुने ही चले गए।

बूढ़ी मां कितनी उतावली थी,
बेटे के सर पे सेहरा होगा।
पत्थर दिल थे,
बूढ़ी मां को भी रुलाकर चले गए।

शहर में इश्क का मौसम था,
इक फूल कुमारी को जल्द आने की कह कर गए थे,
वो महबूब ए वतन थे ।
उस अभागी का दिल दुखाकर भी बड़े रौब से चले गए।

तुम ईश्वर को फूल और पत्तियां चढ़ाकर,
यश और वैभव की चाह रखते हो
भारत मां के भक्त शीश चढ़ाकर,
बिन मुराद मांगे ही चले गए।

चंद रोटियां ज्यादा खाकर तुम्हें 
बल का मद चढ़ जाता है।
सिंघों को भी मूंछ में ताव देकर छेड़ देने वाले,
वीरता क्या होती है 
वीरों को दिखाकर चले गए।

वीरों के उसूल होते हैं,
युद्धों के भी नियम होते हैं।
पर वे कायर क्या जानें,
जो सोते सिंह का शिकार कर, दुम दबाकर चले गए।

कलमकारों की कलमें भी नतमस्तक हैं
वीरता को परिभाषित कर,
कवियों के शब्द कोष शेष कर चले गए।
वो महबूब ए वतन पुलवामा में लहू से इतिहास लिख कर चले गए।

तिरंगे की शान मैं केसरिया रंग और गहरा कर,
उसी तिरंगे में लिपटकर चले गए।
वे महबूब ए वतन थे, वतन की मिट्टी में चले गए।

कितनी महंगी है आजादी कौम की,
अपनी जान से कीमत चुकाकर ।
हमको कर्जदार करके चले गए।।

तुम मोमबत्तियां जलाकर उनका कर्ज उतारने की कोशिश करते हो,
उन मोमबत्ती के पैसों को उनके परिवार को देदेना।
शायद वो पेंसिल
जिसको उनकी नन्ही राजकुमारी अपने हाथों में थामेगी
तुम्हारी दी हुई हो, तो जीवन सफल होजाएगा तुम्हारा।
वहीं नन्ही चिड़िया जिसको वे बिना दुलारे चले गए।

परंपरा बलिदान की देश के इतिहास की निभा कर चले गए।
वे महबूब ए वतन थे अपना इश्क निभा कर चले गए।

प्रवीन  तोमर 
(praveen.tomar.singh@gmail.com)

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