लोक डाउन में शहर खाली हो गया।




आस पड़ोस के उत्तराखंड, बिहार यूपी वाले सब धीरे धीरे निकल गए पूरे एरिया में बस कुछ मुझ जैसे या दो चार दुकानदार और मकान मालिक जो यहीं के हैं वो रह गए हैं।

ढाई साल में पहली बार इस शहर में अजीब सा लग रहा है जहां दो किलोमीटर ऑफिस जाने में पैदल जाओ तो दस मिनट लगते थे ऑटो से जाओ तो ट्रैफिक की वजह से एक घंटा, आज दो किलोमीटर तक तो छत पर खड़े होकर सुनसान दिख रहा है।

धीरे धीरे सब गांव जा रहे हैं।
परमात्मा जो भी कर रहा है कुछ अच्छे के लिए ही कर रहा होगा।

गोबर फेंकने की जितनी जगह थी उतने बड़े कमरे में लोग यहां रहते हैं अब शायद सोना उगलती जमीन का दाम उन्हें समझ आया होगा।

गांव में पिछली बार जब गया था तो एक क्रिकेट टीम जितने ग्यारह लड़के भी खेलने के लिए इकठ्ठे नहीं हो पाए थे, आबादी बढ़ भी रही है तो शहर में, गांव तो उजड़ते जा रहे हैं अब शायद उनको समझ आएगा जब कोई शहरी "गंवार"  कहता है तो वो गाली नहीं जलन होती है उसकी, वो पाउच का दूध पीने वाला क्या जाने गांव क्या होता है।

देहाती और गंवार का मतलब अनपढ़ और जाहिल नहीं है और ना ही वो उन पढ़े लिखे जाहिलो की बराबरी कर सकते जो धरती का दोहन करना अपना अधिकार समझते हैं।

तीन दिन से अपने पड़ोसी के रूम के सामने एक पिंजरे में बंद खरगोश को देख रहा हूं, जो बेचारा मासूम सा सारा दिन अकेला पड़ा रहता है ये खरगोश वैसा ही है जो गांव में भागते दिखते थे खेतों में, ये तो बेचारा भागना तक भूल गया है।

जब गेहूं की कटाई के समय जब खेतों में से ये निकलकर भागते थे तो इनको पकड़ने के लिए हमने कई बार बचपने में अपनी पैर की उंगलियां फोड़ ली हैं। और जब कोई खरगोश का बच्चा अपने परिवार से बिछड़कर खेतों में मिला तो उसे हमने टमाटर, बैंगन, गाजर और मूली ना जाने क्या क्या पकड़ के खिलाया पिलाया और फिर मोटा ताजा करके बड़े बुजुर्ग जबरदस्ती छुड़वा देते पर कभी पिंजरे में कैद नहीं किया,  पर इस खरगोश को तीन चार दिन से बस वही कोर्न फ्लेक्स जैसे डब्बे से कुछ कटोरी में डाल देते हैं।
उनसे कुछ कह भी नहीं सकते वर्ना उनकी प्राइवेट लाईफ में दखल देने पर मकान मालिक से शिकायत कर देगा।

 देहाती और गंवार होना पढ़े लिखे जाहिलो से तो बहुत बेहतर है क्यूंकि भारत और भारतीयता कहीं अब दिखती है तो वो वहीं तो है और फिर ऐसी जिंदगी जो जीवों के लिए कुछ ना कर पाए वो किस काम की।

इस महामारी में लोगों के दृष्टिकोण में अगर कुछ बदलाव ना आया और अहंकार अब भी नहीं त्याग पाए तो क्या राख मानवता जिंदा बची है।

मुझे गर्व है कि मैं देहाती और गंवार हूं और दुख भी कि मैं एक ऐसा देहाती और गंवार हूं जो गांव से दूर है।
एक बैंगन के फूल के साथ ये पोस्ट कर रहा हूं बैंगन मेरा फेवरेट तो नहीं पर बुरा भी नहीं लगता पर कभी बैंगन का खेत देखना दिल हार जाओगे बाबू, इतनी गोरी मेम साहब क्रीम पोत कर जीवन भर में चिकनाहट नहीं पाती जितने कि बैंगन और फिर खेतों में लटकते चिकने बैंगन और उस पर से छोटे छोटे फूल बड़े अच्छे लगते हैं।

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