धार्मिक उन्माद।
धार्मिक उन्माद।
धार्मिक उन्माद
नोट - इस लेख को दो बार पढ़ें अगर समझ न आए तो।
कई दिन लग गए खुद को वापस नॉर्मल करने में, मस्तिष्क को मैंने नफरत का पावर हाउस बना लिया था।
जिन प्रभावों में आया था और जिस अपनेपन से उन विचारों को मैंने ग्रहण किया था उससे व्यक्ति की सामान्य सोचने समझने की क्षमता भी क्षीण हो जाती है।
धार्मिक उन्माद है क्या - तो ये कोई समाधान नहीं केवल एक ब्लेम गेम है जिसमें आप केवल आरोप प्रत्यारोप करते हैं एक दूसरे पर। आपकी मान्यता सही होती है और दूसरे की गलत।
यहां तक कि भाषा को भी एक धर्म से जोडा जाता है कुछ निरे मूर्ख उर्दू शब्दों तक के प्रयोग पर झुलस जाते हैं तो कुछ अंग्रेजी में हिन्दी और संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने की बात करते हैं। जबकि भाषा का सम्बन्ध रीति रिवाज रहन सहन से हो सकता है पर भगवान के सम्बन्ध में भाषा का कोई महत्व नहीं वहां तो रिश्ता ही दिल का होता है।
आप एक खास वर्ग को ही हर समस्या की जड़ मानने लगते हैं। अच्छे में अच्छाई आपको नहीं दिखती पर बुराई आप चुन चुन के ढूंढ़ते हैं।
एक तरफ ईसाई मिशनरीज भारत के दूर दराज के गांव तक पहुंच गए, उन्होंने बिलियन डॉलर्स की फंडिंग से हर जाति के लोगों की स्टडी कराई उनकी जरूरतें, उनकी समस्याएं और उनकी प्रार्थनाएं सब तैयार किया वहीं दूसरी तरफ बड़े बड़े मंदिर सरकार को टैक्स दे कर बचाए पैसे से या तो एकाध बार भंडारा करा देते हैं या गल्ले के उपर कुंडली मारे बैठे रहते हैं। क्या मंदिरों के दायित्व नहीं थे कि वह गुरुकुल खोलें या अपने समाज के गरीब असहाय लोगों को मदद पहुंचाएं? एक तरफ एक मान्यता के लोग विश्व को कन्वर्ट कराने में लगे हैं दूसरी तरफ इस समाज ने अपने लोगों तक की चिंता नहीं की।
अपने संगठनों को ठीक करके उनसे अपने समाज का कल्याण कराने के बजाय हमने वैदिक धर्म के टुकड़े टुकड़े कर दिए - बुद्ध अलग, सिक्ख अलग, जैन अलग और सब अपनी अपनी मान्यताओं को सही सिद्ध करने में लगे हैं।
कोई भी अपने समाज में व्याप्त बुराइयों को स्वीकार कर बदलना नहीं चाहता पर दूसरे से लडने की सबकी इच्छा है।
सोचिए कितना सुंदर लगता जब काशी से संदेश आता कि पूजारी केवल ब्राह्मण कुल का नहीं बल्कि कोई भी जाती का हो सकता है बस उसे पूजा विधि का ज्ञान होना चाहिए, वैसा ही एक संदेश जैसे रमजान में नमाज़ पढ़ने के फायदे बताते हुए आया था।
सामाजिक भेदभाव को हमारे स्थापित मंदिर एक झटके में ख़तम कर सकते थे पर क्या मज़बूरी थी कि उन्होंने ऐसा नहीं किया!
हमारे शंकराचार्य ने कभी खुले रूप से नागरिकों से मोटिवेशनल स्पीकर जिनको समाज संत समझ बैठा उनके बहिष्कार की बात नहीं की! और कथा जिहाद से लोगों को विधर्मी अफीम चटाई जाती रही।
कृष्ण को पियक्कड़ कहा गया उसके बाद भी वह जिंदा है।
चार्ली आब्दो याद है? किस प्रकार अपनी आस्था पर आघात होने पर एक समाज ने नर संहार किया था? केवल एक कार्टून बनाने पर।
सच तो ये है कि हमारे समाज की आस्था उतनी दृढ़ है ही नहीं फिर भी हमें दूसरों में मीन मेख निकालने में ही मजा आता है।
उसके बाद आप कितना भी हिन्दू एकता का ढिंढोरा पीट लें ये कभी आरक्षण पर लड़ेंगे तो कभी जातिवाद पर या sc St act पर क्यूंकि जाल कुछ इस क़दर बुना गया है कि पचड़ा फंसेगा ही फांसेगा।
हर बार संविधान के कुछ हिन्दू विरोधी आर्टिकल का सहारा लेकर हिंदुओं की संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों से पलड़ा झाड़ लेती हैं। कुछ दोष अकर्मण्यता का भी है।
दूसरी तरफ अलग बुद्धि जीवियों की श्रेणी है।
बचपन से आपके मां, बाबा और दादा दादी या फिर बड़े लोगों ने आपको एक नाम रटाया हो ताली बजाते बजाते और फिर कोई कहे कि उस नाम से सम्बन्धित किसी व्यक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो ये केवल आपको खुद की आस्था से ही विमुख नहीं करता बल्कि मस्तिष्क की शांति को भी नष्ट कर देता है अगर उस व्यक्ति को आप सही मान लें।
रामायण का वो एपिसोड आपको याद होगा जब राम वानर सेना के पास आते हैं तो सुग्रीव के सेनापति महावीर हनुमान ये देखने के लिए राम कहीं कोई घुसपैठिए तो नहीं ये जानने के लिए उनसे शास्त्रार्थ करने लगते हैं पर जब वो जान पाते हैं कि वे उनके प्रभु राम हैं तो राम भी उनसे कहते हैं ' भईया आप तो अपनी पंडिताई दिखाने लग गए थे , तो रोते हुए हनुमान अपनी भूल पर खेद जताते हैं"
सत्य यह है कि इस संसार में जीवित सभी प्रणियों ने ईश्वर को नहीं देखा( कम से कम जो लोग ये लेख पढ़ेंगे उन्होंने तो नहीं देखा) पर फिर भी सभी अपनी अपनी आस्थाओं के सहारे बचपन से दी गई शिक्षाओं का पालन करके उस अदृश्य शक्ति की उपासना करते हैं, वो कोई भी हो एक दिन सब ठीक कर देगा इस आस के सहारे काम करते हैं। हमारा मस्तिष्क सकारात्मक रहता है और जब अवचेतन सकारात्मकता से भरा होता है तो परिणाम भी सकारात्मक ही आते हैं।
मैं भी इसी सकारात्मकता से भरा रहता था और अब फिर से उसी सकारात्मकता की शरण में हूं।
जब श्रद्धा और आस्था कमजोर हो जाती है तो भावनात्मक रूप से भी आप कमजोर पड़ जाते हैं।
जो भी होगा, जो भी हो रहा है किसी उद्देश्य से ही हो रहा है।
मेरा हिंदुत्व आपसे तगड़ा है अभी भी क्यूंकि मैंने अपने लोगों की गलतियों पर भी सवाल उठाए और दूसरों पर भी पर जिस प्रकार का विरोध अपने लोगों ने दिखाया( धर्म माफियाओं) ने वो मुझसे न झेला गया।
मैंने गलत मजहबी शिक्षाओं पर भी प्रश्न उठाए थे और उनका विरोध इतना तगड़ा न था जितना अपने धर्म माफियाओं का था, इससे एक बात साफ है हिन्दू को खतरा किनसे है। और इनका कल्याण किसने नहीं होने दिया।
इसलिए कुछ दिन का अवकाश चाहता हूं अपनी बातें भी रखूंगा अपने विचार भी तब तक आप साथ बने रहे तो भी ठीक नहीं भी रहे तो भी कम से कम मेरे मन की शांति तो मुझे वापस मिल गई है।
धार्मिक उन्माद
नोट - इस लेख को दो बार पढ़ें अगर समझ न आए तो।
कई दिन लग गए खुद को वापस नॉर्मल करने में, मस्तिष्क को मैंने नफरत का पावर हाउस बना लिया था।
जिन प्रभावों में आया था और जिस अपनेपन से उन विचारों को मैंने ग्रहण किया था उससे व्यक्ति की सामान्य सोचने समझने की क्षमता भी क्षीण हो जाती है।
धार्मिक उन्माद है क्या - तो ये कोई समाधान नहीं केवल एक ब्लेम गेम है जिसमें आप केवल आरोप प्रत्यारोप करते हैं एक दूसरे पर। आपकी मान्यता सही होती है और दूसरे की गलत।
यहां तक कि भाषा को भी एक धर्म से जोडा जाता है कुछ निरे मूर्ख उर्दू शब्दों तक के प्रयोग पर झुलस जाते हैं तो कुछ अंग्रेजी में हिन्दी और संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने की बात करते हैं। जबकि भाषा का सम्बन्ध रीति रिवाज रहन सहन से हो सकता है पर भगवान के सम्बन्ध में भाषा का कोई महत्व नहीं वहां तो रिश्ता ही दिल का होता है।
आप एक खास वर्ग को ही हर समस्या की जड़ मानने लगते हैं। अच्छे में अच्छाई आपको नहीं दिखती पर बुराई आप चुन चुन के ढूंढ़ते हैं।
एक तरफ ईसाई मिशनरीज भारत के दूर दराज के गांव तक पहुंच गए, उन्होंने बिलियन डॉलर्स की फंडिंग से हर जाति के लोगों की स्टडी कराई उनकी जरूरतें, उनकी समस्याएं और उनकी प्रार्थनाएं सब तैयार किया वहीं दूसरी तरफ बड़े बड़े मंदिर सरकार को टैक्स दे कर बचाए पैसे से या तो एकाध बार भंडारा करा देते हैं या गल्ले के उपर कुंडली मारे बैठे रहते हैं। क्या मंदिरों के दायित्व नहीं थे कि वह गुरुकुल खोलें या अपने समाज के गरीब असहाय लोगों को मदद पहुंचाएं? एक तरफ एक मान्यता के लोग विश्व को कन्वर्ट कराने में लगे हैं दूसरी तरफ इस समाज ने अपने लोगों तक की चिंता नहीं की।
अपने संगठनों को ठीक करके उनसे अपने समाज का कल्याण कराने के बजाय हमने वैदिक धर्म के टुकड़े टुकड़े कर दिए - बुद्ध अलग, सिक्ख अलग, जैन अलग और सब अपनी अपनी मान्यताओं को सही सिद्ध करने में लगे हैं।
कोई भी अपने समाज में व्याप्त बुराइयों को स्वीकार कर बदलना नहीं चाहता पर दूसरे से लडने की सबकी इच्छा है।
सोचिए कितना सुंदर लगता जब काशी से संदेश आता कि पूजारी केवल ब्राह्मण कुल का नहीं बल्कि कोई भी जाती का हो सकता है बस उसे पूजा विधि का ज्ञान होना चाहिए, वैसा ही एक संदेश जैसे रमजान में नमाज़ पढ़ने के फायदे बताते हुए आया था।
सामाजिक भेदभाव को हमारे स्थापित मंदिर एक झटके में ख़तम कर सकते थे पर क्या मज़बूरी थी कि उन्होंने ऐसा नहीं किया!
हमारे शंकराचार्य ने कभी खुले रूप से नागरिकों से मोटिवेशनल स्पीकर जिनको समाज संत समझ बैठा उनके बहिष्कार की बात नहीं की! और कथा जिहाद से लोगों को विधर्मी अफीम चटाई जाती रही।
कृष्ण को पियक्कड़ कहा गया उसके बाद भी वह जिंदा है।
चार्ली आब्दो याद है? किस प्रकार अपनी आस्था पर आघात होने पर एक समाज ने नर संहार किया था? केवल एक कार्टून बनाने पर।
सच तो ये है कि हमारे समाज की आस्था उतनी दृढ़ है ही नहीं फिर भी हमें दूसरों में मीन मेख निकालने में ही मजा आता है।
उसके बाद आप कितना भी हिन्दू एकता का ढिंढोरा पीट लें ये कभी आरक्षण पर लड़ेंगे तो कभी जातिवाद पर या sc St act पर क्यूंकि जाल कुछ इस क़दर बुना गया है कि पचड़ा फंसेगा ही फांसेगा।
हर बार संविधान के कुछ हिन्दू विरोधी आर्टिकल का सहारा लेकर हिंदुओं की संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों से पलड़ा झाड़ लेती हैं। कुछ दोष अकर्मण्यता का भी है।
दूसरी तरफ अलग बुद्धि जीवियों की श्रेणी है।
बचपन से आपके मां, बाबा और दादा दादी या फिर बड़े लोगों ने आपको एक नाम रटाया हो ताली बजाते बजाते और फिर कोई कहे कि उस नाम से सम्बन्धित किसी व्यक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो ये केवल आपको खुद की आस्था से ही विमुख नहीं करता बल्कि मस्तिष्क की शांति को भी नष्ट कर देता है अगर उस व्यक्ति को आप सही मान लें।
रामायण का वो एपिसोड आपको याद होगा जब राम वानर सेना के पास आते हैं तो सुग्रीव के सेनापति महावीर हनुमान ये देखने के लिए राम कहीं कोई घुसपैठिए तो नहीं ये जानने के लिए उनसे शास्त्रार्थ करने लगते हैं पर जब वो जान पाते हैं कि वे उनके प्रभु राम हैं तो राम भी उनसे कहते हैं ' भईया आप तो अपनी पंडिताई दिखाने लग गए थे , तो रोते हुए हनुमान अपनी भूल पर खेद जताते हैं"
सत्य यह है कि इस संसार में जीवित सभी प्रणियों ने ईश्वर को नहीं देखा( कम से कम जो लोग ये लेख पढ़ेंगे उन्होंने तो नहीं देखा) पर फिर भी सभी अपनी अपनी आस्थाओं के सहारे बचपन से दी गई शिक्षाओं का पालन करके उस अदृश्य शक्ति की उपासना करते हैं, वो कोई भी हो एक दिन सब ठीक कर देगा इस आस के सहारे काम करते हैं। हमारा मस्तिष्क सकारात्मक रहता है और जब अवचेतन सकारात्मकता से भरा होता है तो परिणाम भी सकारात्मक ही आते हैं।
मैं भी इसी सकारात्मकता से भरा रहता था और अब फिर से उसी सकारात्मकता की शरण में हूं।
जब श्रद्धा और आस्था कमजोर हो जाती है तो भावनात्मक रूप से भी आप कमजोर पड़ जाते हैं।
जो भी होगा, जो भी हो रहा है किसी उद्देश्य से ही हो रहा है।
मेरा हिंदुत्व आपसे तगड़ा है अभी भी क्यूंकि मैंने अपने लोगों की गलतियों पर भी सवाल उठाए और दूसरों पर भी पर जिस प्रकार का विरोध अपने लोगों ने दिखाया( धर्म माफियाओं) ने वो मुझसे न झेला गया।
मैंने गलत मजहबी शिक्षाओं पर भी प्रश्न उठाए थे और उनका विरोध इतना तगड़ा न था जितना अपने धर्म माफियाओं का था, इससे एक बात साफ है हिन्दू को खतरा किनसे है। और इनका कल्याण किसने नहीं होने दिया।
इसलिए कुछ दिन का अवकाश चाहता हूं अपनी बातें भी रखूंगा अपने विचार भी तब तक आप साथ बने रहे तो भी ठीक नहीं भी रहे तो भी कम से कम मेरे मन की शांति तो मुझे वापस मिल गई है।

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