मेरी प्रेमिका कहां है?

 रात के ढाई बज गए अब तो शायद सारी उम्मीदें भी किसी एक नई उम्मीद के जागने की उम्मीद में सो चुकी हैं।


जिंदगी कहां से बह रही है और कहां रुकेगी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, हर चीज से मुंह फेर लेने की जैसे आदत सी हो गई है।

इंस्टेंट दुनियां में जैसे फिट नहीं बैठ पा रहा हूं, कभी कभी लगता है इस अकेलेपन से निजात पाने के लिए किसी बंधन में बंध लूं। पर इस बुलेट ट्रेन से तेज भागती दुनियां में श्रीकांत की प्यारी कहां इंतजार करेगी, या फिर विनय सिंह की सोफिया जो प्रेम के परम होने को समझे।

फूहड़ता के जमाने में मैं गजलों और गांव के तरानों का स्वाद लेता हूं, वन नाइट स्टैंड और ब्लाइंड डेट के जमाने में मुंशी जी और सरथ बाबू जी के उपन्यासों की प्रेमिका खोजता ये मेरा मन दो समय के अंतरालों में फंसकर रह गया है।

जब भी जीवन में कुछ अच्छा होने लगता है तो अंदर बैठे कहानीकार को लगता है कि उसकी मृत्यु के दिन निकट आ गए इसलिए सारी खुशियां अपनी बर्बाद कर लेता हूं।

पर इस सोसल मीडिया की दुनियां में सालों का सफर तय करके बनी एक कहानी को पढ़ने का समय किसके पास है? 4 साल से श्री लेखा से रोज मिन्नतें करता हूं, पर श्री है कि पन्ने पर आने को राजी ही नहीं होती। कहती है कि "समय देने का जमाना है बाबू, आजकल समय न दो तो छपरी लड़कियां भी बीपीएल कर देती हैं," श्री भी सच कहती है इतनी सुंदर कहानी क्या मैं बस रविवार - रविवार को लिखकर पूरी कर लूंगा?

कहानियों की तलाश में घर से हजारों मील की दूरी तय करके भगवान के अपने देश तक तो आ गया, कहानियां भी मिल गईं पर अब पता नहीं मैं अकेलेपन के साए में कहानियों से जैसे डर सा रहा हूं। रात के ढाई से तीन बज गए खुले आसमान में धुंधले से चांद को देखकर अपने सपनों को टालते रहने की लापरवाही इस सुकून में भी मुझे खाए जा रही है।

कलम की धार तो प्रयासों से साध लूंगा पर समय को कैसे साधूं, इस बेचैन मन को आराम देने वाला मेरी कहानियों का हमसफर जो मुझे नियमित कर देगा उसे कहां खोजूं?

मेरी उपन्यासों वाली प्रेमिका इस घंटे के हिसाब से रिश्ते बदलने वाली दुनियां में मिलेगी भी कि नहीं इसकी उम्मीद भी धुंधली सी है, पर अगर इस दुनियां में मैं हूं तो वो भी कहीं होगी।

मैं रात को आसमान के नीचे लिख रहा हूं और वो तारों के नीचे पढ़ रही होगी, मैं शून्य की आवाज सुन रहा हूं, धुंधली चांदनी से नहा रहा हूं, दैवीय आकाश को तकता हुआ मैं खूंखार से अंधेरे में शांत खड़े पेड़ों के आसपास से झिंगुरो की आ रही आवाजों को लिख रहा हूं।

वो क्या कर रही होगी? वो कहां होगी? क्या मेरी तरह उसे भी रात दिन से फर्क नहीं पड़ता होगा? क्या उसके लिए भी शरीर से चिपटने से ज्यादा आंखों में आंखें डालकर घंटों प्रेम की कविताएं करना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा? क्या वो भी सुन्नता को सुन पाती होगी? क्या उसे भी अंधेरा लुभाता होगा? क्या उसके मन में भी सवालों का गुच्छा बनता रहता होगा?

ए चांद तेरी ही चांदनी में छत पर कहीं बैठी होगी वो, ए सितारों कहीं मिले तो उसे बताना कि एक लेखक की कहानियां अधूरी हैं, इस नए जमाने में एक पुराना प्रेम बाकी है जो उसके लिए इंतजार कर रहा है। कॉफी और शराब के जमाने में किसी नदी के किनारे पंक्षियों की आवाज मैं कोई उसके लिए पायल लेकर बैठा है जिस पायल की खनक से पूरा हो जाऊंगा मैं, मेरी कहानियां, मेरा प्रेम और इस नए जमाने में पूरा हो जाएगा एक पुराने जमाने का प्रेम।

उसका बस उसका~ प्रवीन



Comments

  1. Achha hai wo प्रशनों में है, ख्यालों में है,
    पूर्णता कहीं नहीं है।में तुम्हारा जवाब नहीं बनना चाहती प्रश्नों का सार बनना है मुझे,दिल में रहना नहीं है मुझे खुले आसमां में साथ उड़ना है
    ऐसा कौन कहता है आजकल की भागती जिंदगी
    में।ख्याल जब तक ख्याल हैं खूबसूरत है।

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