कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय।

 कुछ क्षण का प्रेम। गया यात्रा के समय।



तीन टीशर्ट, तीन पैंट और एक शर्ट रखके आज से एक महीने नौ दिन पहले घर से निकला था साथ में एक स्वीट शर्ट और हुडी रखी थी क्यों कि पहाड़ों का पहले से सोचकर ही निकला था। इतने दिन हो गए अलग अलग शहरों की हवा लगे, कि अब वापस लौटा नहीं जा रहा है, एक दिन सोच रहा था कहां जाऊं लौटकर हर जगह तो पूर्ण विराम लगा आया हूं, लौटने का ठिकाना कहीं छोड़ा हो तो जाया जाए। 


दिल्ली दंगों के समय जब नाले में से हाथ बांधे एक लाश को निकाला गया था तब मेरे शरीर में कंपन्न होने लगा था और आवेश में मैंने कहा था कि मैं संन्यासी होकर कर्म करूंगा, वो केवल आवेश ही था, क्योंकि संन्यासी होना क्या होना होता है मैं नहीं जानता था। अगर केवल कपड़े और कपड़ों का स्टाइल बदल देने मात्र को संन्यासी होना कहते तो ये तो बिलकुल मिथ्याचार है सन्यास के नाम पर।


घूमते - घूमते, सड़कों पर दुकानों पर ट्रेन के डब्बों में पहाड़ों में, बारिशों में हर जगह मैं देखने लगा क्या कोई प्रश्न अब बाकी रह गया है? तो मन खाली सा हो जाता, फिर प्रश्न करता तो क्या सारा देख लिया है, सब कुछ अनुभव कर लिया है? उत्तर आता नहीं!  बड़ा परेशान हुआ, जब सब कुछ हुआ नहीं तो प्रश्न कहां गए! इस अवस्था ने बहुत दिन तक घेरे रखा।


संसाधन खत्म होते गए, शून्य के पास आते ही मैंने उसे फोन किया, क्या तुम उसके साथ रह पाओगी। उसे ज्ञात था मैं शून्य होने वाला हूं, वो जानती थी कि चारों तरफ पूर्ण विराम लगाए ये मूर्ख अपने सारे विकल्प खत्म करके मुझे विकल्प दे रहा है। उसने मुझे अपमानित किया, परिवार के सामने अपमानित किया, मेसेज के स्क्रीनशॉट परिवार को भेज दिए, परिवार की नजरों में मेरा चरित्र हरण हो रहा था, पर मुझे कोई दुख नहीं हो रहा था, मैं शांत हो रहा था और शांति मेरे व्यवहार में सम्मिलित हो रही थी, सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक टिकट कंफर्म होने के लिए स्टेशन पर ही इंतजार करता रहा, टिकट कंफर्म नहीं हुई तो जो ट्रेन जा रही थी वही पकड़ली, बंगाल से चिढ़ हो गई थी, अजीब सी घिन, भोजन भी खराब मन से किया, इसीलिए भोजन ने उपकार के बजाय अपकार किया और मुझे बर्धमान में उतरना पड़ा।


सुबह फिर ट्रेन पकड़ी गया के लिए, मन जिसपर प्रहार हो रहे थे वह और पवित्र और सुंदर होता जा रहा था। खिड़की के बाहर देखते हुए अपने हाथों पर हवा का ठंडापन में महसूस कर रहा था मैं कुछ घंटे की और बात है फिर एक और सफर की मंजिल आने वाली थी माने एक और रुकावट। 


अचानक से दो किन्नर ट्रेन में तालियां बजाते आए, आसपास से लोगों से मांगने के बाद मुझसे भी मांगा, विचारमग्न मन उसे देखने लगा, ईश्वर से भी कभी कभी काम अधूरे रह जाते हैं फिर मैं कौन हूं, न तो ईश्वर ने इसे नर होने दिया न मादा, उसके बाद भी खूबसूरत है, अधूरे काम भी सुंदर होते हैं। इस विचार ने मेरे चेहरे पर जो मुस्कान बिखेरी उससे मैं सुंदर दिखने लगा। 


मैंने दस रुपए उसे दिए, लेकिन आम व्यक्ति की तरह नहीं बल्कि सन्यास के उस तेज के साथ जो चेहरे को सुंदर बना देता है, वो तेज जो मोहित कर लेता है, वो शांत होना जो दिल की धड़कने बड़ा देता है, वो दृष्टि जो नग्न कर देती है, जो अपने आवेश में कर लेती है। 


इस प्रकार की हंसी के साथ पैसे पाकर उससे रहा न गया उसने मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए अंग्रेजी में कहा, "so cute"

फिर वह खड़ी होकर दूसरे व्यक्ति से अपनी दुआओं के बदले पैसे लेने का इंतजार करने लगी, उस इंतजार में उसकी नजर फिर एक बार मुझ पर आकर टिकी और उसने होठ बनाकर दूर से मुझे चुम्मन किया, मैंने तुरंत उसके आदर का सत्कार किया और उसे उसी मुस्कान के साथ होठ बनाकर दूर से चुम्मन किया। 


वह जहां खड़ी थी मेरे पास आकर झुक गई और बोली मेरा नाम एना है, एना दास। मैंने उसे कहा "तुम बहुत खूबसूरत हो" उसने मुझे अपना नंबर दिया और पिघलती हुई सी चली गई। 

उस छण जब मेरे आसपास का वातावरण नगण्य हो गया था, जब चेहरे और सवाल दिखने बंद हो गए थे, कौनसी दृष्टि में कौनसा ताना है, कौनसी हाय है, कौन किस रूप में देख रहा है उस सबको छोड़ मैंने प्रेम का स्वागत करके सन्यास का पहला पाठ सीखा। 


थोड़ी देर बाद मुझे फोन आया, वैसे मैं कलेक्शन वालों की वजह से अननोन नंबर्स नहीं उठता, लेकिन ये मैंने उठा लिया, "एना", मैंने पूछा क्या हुआ, उसने कहा "कुछ नहीं बस ये चेक कर रही थी अभी जो दस मिनट पहले हुआ क्या वो सच था"? 


"सत्य तो केवल जो हो रहा है वही है, जो गुजर चुका है वो बस एक याद है, एक पुराने सपने में और बीते हुए वक्त में कोई अंतर नहीं बस एक सामान्यता है, दोनों ही स्मृति बन जाते हैं। "


उसने कहा कि वो रोज इसी रूट पर ट्रेन में पैसे मांगने आती है क्या मैं उससे मिल सकता हूं दोबारा, मैंने कहा मैंने आज रुकने के लिए ट्रेन स्टेशन के पास ही होटल बुक किया है, कल शायद मिलना हो सके, सुबह मैं बुद्ध के पास गया, बोध गया में, वहां एक अलग वातावरण था, अजीब सा शांत मन जो भयभीत भी करता है और प्रसन्न भी, भयभीत यूं कि शांत मन एक सोते हुए बच्चे की तरह है अभी सोते हुए शांत है पर रात को सोने नहीं देगा अगर ये दिन में सो लिया तो।


बोधि वृक्ष के नीचे देश विदेश के भिक्षु ध्यान में बैठे थे, आध्यात्मिकता के पहलू प्याज की तरह हैं ज्यादातर परतें मूर्खता की हैं, उस वृक्ष के नीचे जिसे बुद्ध को प्रश्नों के उत्तर मिले भावुक भक्त उस वृक्ष को महान समझते हैं, वो वृक्ष सोचता होगा मैंने तो छाया देने का, हवा देने का वही काम किया जो मेरा कर्म है, बुद्ध के चरणों से ज्यादा मन से ज्यादा उसके द्वारा दिए गए ज्ञान से ज्यादा वह स्थान महत्वपूर्ण है आज जहां उन्होंने व्याख्यान दिया था। 


मैं पास में ही एक बेंच पर पेड़ की छांव में बैठ गया, हल्का सा आंख बंद करके उस शांति का अपने मन ही मन बसाने लगा, जो महसूस हो रही थी। एक सवाल मन मैं आया क्या मेरा विचार एक नहीं हो सकता, क्या बदलाव जरूरी है, कुछ सालों पहले मेरे विचार कुछ और थे, अब कुछ और हैं, लोग मुझे दोगला समझते हैं क्या ये बदला नहीं जा सकता? 


उस पेड़ की छांव में बैठे बैठे विचार करने लगा,  मैं वाशरूम जाने के बाद साबुन से केवल हाथ ही क्यों धोता हूं? मल ने मेरे जिस स्थान को छुआ उसे भी साबुन से धोकर तभी तो पवित्र होऊंगा? लेकिन मल तो शरीर के अंदर था! और शायद अभी भी है, मैं फिर केवल साबुन से हाथ धोने भर से खुद को अपवित्र से पवित्र कैसे मान रहा हूं! गांव में बुआ शौच के हाथ धोए बगैर किसी भी वस्तु से छू जाऊं तो उसे साबुन से धोती है, लेकिन ताज्जुब है कि राख या मिट्टी से केवल हाथ धो लेने से वह भी मुझे पवित्र मान लेती है। 


दोगलापन से निजात पाना मतलब मनुष्य कोई भी अपनी आम क्रिया या अंग त्याग दे ऐसा है, जैसे मनुष्य प्रवृति है दोगलापन उसी में समाविष्ट है और इतनी गहराई से है कि उसे अलग करने का सोचना मतलब अपने हाथ पैर काटने जैसा है।


जस को तस देखने के लिए केवल ज्ञान होना आवश्यक है, और ज्ञान तभी बढ़ेगा जब प्रश्न सही होगा, दंत कथाओं और मान्यताओं ने जितना भ्रमित किया है उनकी सच्चाई ढूंढने जाओगे तो भ्रमति ही होते जाओगे, स्वयं को खोलते जाओगे तो सारे दोगले पन से मिलते जाओगे।


बुद्ध को प्रणाम कर मैं वापस आकर पटना के लिए ट्रेन में बैठ गया, शाम के समय मुझे एना का फोन आया, उसने फोन उठाते ही पूछा, "मुझे माफ करना कल से मेरे साथ जो भी हो रहा है मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, अभी देखो मुझे याद आया कि मैंने तो तुम्हारा नाम भी नहीं पूछा, तुम्हारा नाम क्या है"? मैंने कहा "प्रवीन " उसने पूछा आज शाम को स्टेशन पर मिल पाओगे", मैंने उसे बताया कि मैं पटना पहुंच गया हूं।


वो थोड़ी देर शांत रही, उसने कुछ देर बाद बोला, "जो मैंने कल अनुभव किया वो बार - बार किसी के जीवन में हो भी नहीं सकता है"। अपना ध्यान रखना।

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