शारदा नंदन।


 

है कलरव चिड़ियों का, झरनों की है आवाज। मन जोर से पहाड़ की चोटी को देखकर चीखना चाहता है, "महादेव!!!" "शंभू" "शंकरा". एक यात्रा है जो मैं कभी खत्म करना नहीं चाहता, एक समय है जो एक दिन मुझे खत्म कर देगा। एक मोक्ष समान अवस्था है, एक इच्छा है कि तीस किलो के बैग को पचास किलो का कर लेता हूं, बहुत सारे कपड़े लेकर घूमने के बजाय दो भगवा शॉल लेता हूं, टेंट जो खरीदा था वो साथ लेता हूं और खाना बनाने का सामान, फिर निकल पड़ता हूं, अपने जीवन के बोनस के दिनों का आनंद लेने, दिव्यता को समेटने, असीम, अनंत, संभावनाओं को आत्मसात करने।


शंकरी, झरकटी और कंकड़ पत्थरों के रास्तों में अकेले - अकेले चलने का आनंद, साथ में चलने योग्य साथी न होने का दुख नीचे छोड़कर में ऊपर चढ़ता जा रहा हूं, नीचे एक अलीगढ़ का लड़का अपने दोस्त से मिन्नतें कर रहा है, "भाई बस चार सौ मीटर दूर है" मेरे चेहरे पर मुस्कान जैसे स्थाई होती जा रही है, जबरदस्ती का साथी खींचने के बजाय अकेले चढ़ जाओ, जहां बैठना चाहो बैठ जाओ, जहां से लौटना चाहो लौट जाओ, जहां अकेले बैठकर सोचना चाहो सोचो, विचारो और फटकार मारते हुए जबरदस्ती के बंधनों को आगे बढ़ जाओ।


सन्यास लेकर लोग नाम बदल देते हैं, बड़े - बड़े भारी नाम, मेरा तो नाम ही प्रवीण है, मुझे न औपचारिक घोषणा करने की जरूरत है और न ही दिखावा, न ही मैं जप और तप की आवश्यकता समझता हूं, मोक्ष, स्वर्ग और एक सुंदर संसार ये जीवन ही है, मुक्त, अनंत, आनंदित, अनौपचारिक और स्वतंत्र। मुझे अगर नाम रखना होता तो मैं रखूंगा, "शारदानंदन" बचपन से जिसको मैंने अलग - अलग रूपों में पाया वो मां का प्रेम, जिसे मां के रूप में न पाकर बाकी सभी रिश्तों में बस खोजता ही रहा। जावेद अख्तर की एक लाइन है - "अपने महबूब में अपनी मां देखें, बिन मां के बच्चों की ऐसी फितरत होती है"


एक निर्णय जीवन की स्थिति बदल देता है, जो नहीं है उसे पाने के लिए दिन और रात को टाइम टेबल में बदलके, जीवन में कितने दिन बचे हैं, उसे जीने के बजाय छटपटाते रहना, "हाय जिंदगी मुश्किल है, हाय जिंदगी मुश्किल है" वो जीवन के स्कॉलर्स, पंडित जिन्होंने खोज की मन के भीतर झांककर, "अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम"! 


वे लोग जो दुखी हैं, किसी लक्ष्य की प्राप्ति न होने से, किसी अपने से दूर हो जाने से, किसी आशा के टूटने से, लोगों के व्यवहार से, जीवन के बर्ताव से, वे दुखी रहने ही योग्य हैं, उन्होंने न केवल जीवन के खोजी पंडितों, स्कॉलरों की तपस्या से खोजे आनंद के सूत्रों का अपमान किया है और जीवन को स्थाई मानने की भूल की है, जिसने भूल करी है क्षति तो उसकी होगी ही, फिर कर्मों को, नक्षत्रों को और आसपास की घटनाओं को दोष देकर व्यक्ति भूल को मूर्खता यानी प्योर चुतीयाप में बदल देता है।


लखनऊ से सीधा आगरा आया था, चार रातें आगरा में हॉस्टल में बस लैपटॉप में फिल्में देखता रहा और सोता रहा, हॉस्टल में लोगों ने पूछा भाई ये सोना तो घर पे भी हो ही जाता है, सोना तुमको महंगा नहीं पड़ रहा? उनको कौन बताए अपने शहर से बेहतर कोई शहर नहीं लगता पर आगरा बचपन से अबतक हर याददाश्त में बसा हुआ है, उसे मुझे घूमने की जरूरत नहीं जो कुछ समय बाद - बाद ही मेरी स्मृतियों में घूमता रहता है।


इससे पहले भी मैंने कई बार मुंबई की टिकट की है, लेकिन इस बार चार दिन पहले करली थी, चार दिन बाद भी टिकट कंफर्म नहीं हुई, स्टेशन पर जो ट्रेन मिली उसी में बैठ गया और शाम होते - होते पहुंच गया ऋषिकेश। 


ऋषिकेश में एक पुराना दोस्त प्रशांत रहता है, मेरे जीवन में प्रशांत का एक बड़ा रोल है जो शायद उस झंडू को भी न पता हो, लिखता मैं बचपन से ही था, लेकिन जिस तरीके का लेखन आप पढ़ रहे हैं वो मैं शायद ही लिखता अगर प्रशांत ने ऑफिस में मुझे उसके ओपन माइक के विडियोज न दिखाए होते, मेरा पहला और आखिरी ओपन माइक स्लॉट भी उसी की वजह से मिला था। 


ऋषिकेश स्टेशन पर वो मुझे लेने आया, अपने घर लेके गया, फिर घर का स्वादिष्ट भोजन किया, वो चाहता था मैं रात को वहीं रुकूं पर मेरी इच्छा थी कि मैं हॉस्टल में ही रुकूंगा, रात को बाइक से ऊपरी तपोवन तक मुझे वह छोड़ कर गया। उसके घर एक पहाड़ी कुत्ता है, जिप्सी, जो कि काले रंग का है और बहुत मिलनसार है।


रात बारह बजे में हॉस्टल में सोने गया, एक दो घंटे बाद ही आंख खुल गई, जैसे किसी ने नींद से जगाया हो, देखा तो बारिश का पानी डोरमिटोरी में भर गया है, मेरा बैग जिसमें लैपटॉप, कैमरा और सारा सामान था वो भी थोड़ा भीग गया है, थोड़ी देर और मेरी चेतना को कोई न पुकारता तो सुबह तक सत्यानाश हो जाता समान का।


सुबह उठकर पहाड़ चढ़ने निकल आया हूं और, और महादेव के छोटे से मंदिर के सामने बने चबूतरे पर जो पीपल का पेड़ है उसके नीचे बैठकर इस यात्रा का अबतक का हाल लिखा है।


अर्ध नारेश्वर, उमापति शंभूनाथ की जय। हर हर महादेव।


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