मैं खुद को इश्क का फरहाद समझता था।


मैं खुद को इश्क का फरहाद  समझता था,
तेरे सामने खुद को पाकर कुछ लब्ज न जोड़ पाया।

गुफ्तगू करने की फिराक मैं था मैं,
ये इल्म ना रहा कि हुस्ने नूर को सलाम भी न कर पाया।

शहरे इश्क आगरा ने सिखा कर भेजा था,
कि कैसे इजहारे इश्क होता है।
मुफलिसी के दिन थे मैं ख़्वाबों का ताजमहल ना बना पाया।।

अभी भी आस है कि ये मुफलिसी हट जाए,
काली रातों को नूर गटक जाए।
तू जो तशरीफ हमारी मिलखियत में लाए,
क्या खबर कि ये तोमर नया फरहाद बन जाए।

लफ़्ज़ों का फन तो गंगा जमुनी तहजीब ने सिखाया है,
हर्फ दर हर्फ इजहारे काबिल बनाया है।
बड़ा गुरूर था हमें इस तालीम का,
शायद हमारा गुरूर तोड़ने के लिए ही खुदा ने तुझे बनाया है।

गलतफहमियों का अंबार लगा लेते हैं,
कुछ शख्स इश्क का अंदाज लगा लेते हैं।
होश नहीं रहता दुनियां जहां का जब वो मुस्कुराकर पास से गुजर जाती है।
पता नहीं कैसे ये अमन के दुश्मन इश्क मैं मजहब अडा देते हैं।

जिसको भी गुरूर हो अपनी होशियारी और बहादुरी का
ऐलान ए जमूरियत है कि वो मैदान ए इश्क मैं आए।
यहां जंग जीतने के लिए अस्ले की दरकार नहीं है,
कभी कभी फैसले खामोशियां कर देती हैं।

Writer (Praveen Tomar)
Email address- praveen.tomar.singh@gmail.com

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