मुझको आदत नहीं है।















Watch this poem on Youtube recited by me.

बड़ा फिक्र करते हो हालातों के नाजुक होने का,
इमारतें तबाह होते देखी हैं पानी के जलजलों से।
यूं हल्की हल्की बूंदों से रुकने की मुझको आदत नहीं है।

सुनाते तो हो मुझे हर रोज किस्से अपनी मजबूरियों के,
यूं खुद के गम गुनगुनाने की मुझको आदत नहीं है।

बहुत खफा रहते हो हमसे हर वक़्त शिकायत रहती है
मान भी जाओ की मुझे किसी को मनाने की आदत नहीं है।

ढूंढ तो रहे हो तुम कुछ अपने लिए मुझमें, मैं किसी काम न आऊंगा, मेरे टूटे हुए होने का कोई गवाह नहीं है।

बहुत उम्मीदें न बांध लेना मुझसे,
कि गिरते पड़ते पहुंचा हूं यहां,
यूं ठहरने की मुझको आदत नहीं है।

क्या धमकाते हो मुझे हर वक्त बर्बाद करने को,
जाओ भी ऐसी भी मेरी कोई तिजारत नहीं है।

सुना है शोहरत की बहुत चाह रखते हो तुम,
दो वक़्त पेट भरने के बाद मुझको और कमाने की आदत नहीं है

अब निकला ही हूं तो कुछ हासिल करके ही फिरूंगा,
यूं भीड बने रहने की मुझको ख्वाहिश नहीं है।

उम्मीद है कि बुझती नहीं मेरी,और शाम ढलते ही घर लौट आने की मुझको आदत नहीं है

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