शहर गांव की नजर से।
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खुली हवा में घूमता था,
जन्नत सा नजारा था,
जब पहली बारिश की खुशबू सूंघता था।
आ गया हूं कमाने इस शहर में,
कुछ रोज में लगता है हो गए जमाने इस शहर में।
जन्नत सा नजारा था,
जब पहली बारिश की खुशबू सूंघता था।
आ गया हूं कमाने इस शहर में,
कुछ रोज में लगता है हो गए जमाने इस शहर में।
हवा कितनी साफ थी ये कोयल गाके बताती थी,
खुशी के इजहार में पंक्षि पंख फड़फड़ाते थे,
लाश लिए खड़े हैं दरख़्त राहों में अपनी अपनी,
हवा भी जहर है तेरे शहर में।
हवाई जहाज तो बहुत उड़ते हैं
पर चिड़िया गुम है तेरे शहर में।
खुशी के इजहार में पंक्षि पंख फड़फड़ाते थे,
लाश लिए खड़े हैं दरख़्त राहों में अपनी अपनी,
हवा भी जहर है तेरे शहर में।
हवाई जहाज तो बहुत उड़ते हैं
पर चिड़िया गुम है तेरे शहर में।
हर शक्श नाम से जानता था,
कहीं न कहीं से कोई रिश्ता मानता था,
हर आदमी अज नबी सा क्यूं है इस शहर में,
इल्म तो है पर तहजीब गुम है तेरे शहर में।
कहीं न कहीं से कोई रिश्ता मानता था,
हर आदमी अज नबी सा क्यूं है इस शहर में,
इल्म तो है पर तहजीब गुम है तेरे शहर में।
जिस रोज घर रोटी अच्छी न लगती थी
किसी भी घर चला जाऊं मेरी भी थाली लगती थी
रोटियां कम थीं पर कोई भूखा न सोता था
हर शक्श रोता सा क्यूं है इस शहर में
कहीं रोटियां फिकती हैं कही लोग भूखे सोते हैं तेरे शहर में।
किसी भी घर चला जाऊं मेरी भी थाली लगती थी
रोटियां कम थीं पर कोई भूखा न सोता था
हर शक्श रोता सा क्यूं है इस शहर में
कहीं रोटियां फिकती हैं कही लोग भूखे सोते हैं तेरे शहर में।
ठंड जब लगती थी गांव के चौक में आग जलती थी
बैठता था तजुर्बा वहां तजुर्बे की तालीम मिलती थी
लिखा पड़ा कम था मेरा गांव पर हर बुजुर्ग को इज्जत मिलती थी
तजुर्बे की ये तौहीन क्यूं है तेरे शहर में।
बूढ़े बाप के लिए जगह नहीं रहती बेटे के घर में।
बैठता था तजुर्बा वहां तजुर्बे की तालीम मिलती थी
लिखा पड़ा कम था मेरा गांव पर हर बुजुर्ग को इज्जत मिलती थी
तजुर्बे की ये तौहीन क्यूं है तेरे शहर में।
बूढ़े बाप के लिए जगह नहीं रहती बेटे के घर में।
मेहनत की थकावट सुलाती थी रोज मुझे
गलगलीया की चहचाहत उठाती थी रोज मुझे
इतना शोर सराबा क्यूं है इस शहर में
उठने की छोड़ आंख तलक नहीं लगती है तेरे शहर में
गलगलीया की चहचाहत उठाती थी रोज मुझे
इतना शोर सराबा क्यूं है इस शहर में
उठने की छोड़ आंख तलक नहीं लगती है तेरे शहर में
चाचियां बहुत थीं मेरी गांव में
भतीजियां भी सलिखे से दुपट्टा किया करती थीं
ये रिवाज नहीं है तेरे शहर में
सालीखा छोड़ दुपट्टा किधर है तेरे शहर में।
भतीजियां भी सलिखे से दुपट्टा किया करती थीं
ये रिवाज नहीं है तेरे शहर में
सालीखा छोड़ दुपट्टा किधर है तेरे शहर में।
इश्क तो वहां भी होता था आम बात है
रास्ते चलते वक्त कभी उनसे नजरें मिल जाती थीं
ये भी एक खास बात है
इश्क बेहिसाब था इश्क करने का एक सलीखा था।
रास्ते चलते वक्त कभी उनसे नजरें मिल जाती थीं
ये भी एक खास बात है
इश्क बेहिसाब था इश्क करने का एक सलीखा था।
इश्क सिर्फ हुस्न तक महदूद है इस शहर मे
इश्क का बाजार लगता है यहां
ठगा - ठगा सा हर महबूब तेरे शहर में।
इश्क का बाजार लगता है यहां
ठगा - ठगा सा हर महबूब तेरे शहर में।
हर शक्श के गिरे हुए अरमान क्यूं हैं
अदब छोड़ ये बदतमीजियां क्यूं हैं,
लड़कियां सिर्फ सामान क्यूं हैं तेरे शहर में।
अदब छोड़ ये बदतमीजियां क्यूं हैं,
लड़कियां सिर्फ सामान क्यूं हैं तेरे शहर में।
गोलियां नहीं थी लट्ठ भतेरे थे,
कोई किसी बेटी से बद सलुकी करे
तो हर घर से लट्ठ निकलते थे
गांव के मामले गांव में ही निकला करते थे,
कोई किसी बेटी से बद सलुकी करे
तो हर घर से लट्ठ निकलते थे
गांव के मामले गांव में ही निकला करते थे,
ये खासियत नहीं है तेरे शहर में
गोलियां का जोर हो पर ताकत नहीं है तेरे शहर में
जहां गोलियों के शोर से आसमां थर्राना था,
सियासत हिल जाए इस कदर शेर सा गुर्राना था,
किसी की आबरू का जुलूस निकाला था तेरे शहर में
किसी के लाडली के लूट जाने पर
मोमबत्तियां की बारात लेकर निकले थे तेरे शहर में।
गोलियां का जोर हो पर ताकत नहीं है तेरे शहर में
जहां गोलियों के शोर से आसमां थर्राना था,
सियासत हिल जाए इस कदर शेर सा गुर्राना था,
किसी की आबरू का जुलूस निकाला था तेरे शहर में
किसी के लाडली के लूट जाने पर
मोमबत्तियां की बारात लेकर निकले थे तेरे शहर में।
सहूलियतें बहुत हों पर
बेटियां महफूज़ नहीं है तेरे शहर में।
बेटियां महफूज़ नहीं है तेरे शहर में।
~ प्रवीन ठाकुर
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