भीष्म प्रतिज्ञा


                                                       भीष्म प्रतिज्ञा                                                                            


रास्ते जो वीरान हैं, फासले जो अनजान हैं,
गुम खामोशियां और अंधेरे ये गुम नाम हैं।
अपने दिल से आती आवाजों को सुनना है,
दौड़ती इस दुनियां में रुकना मना है।

क्या हश्र होगा, क्या अंजाम होगा, क्या इंतेज़ाम होगा,
रिवायत है यहां तू कुछ नया कर तेरे सर पे हर इल्जाम होगा।


संघर्षों से सीख तू, मांग ना दया की भीख तू,
हर गलती पे ज्ञान मिलेगा, ले नई सीख तू।

भूल में क्षमा बन, पापों में प्रायश्चित बन,
ढलती शाम का दीपक बन, बुझती सांस का जीवन बन।
नारायण भी मौन तोड़े ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा बन।

परिणाम में प्रशंसक बहुत मिलेंगे,
प्रयास में किसी से ये आस न कर।
यूं गिर न थक हार कर, लड़ता रह फिर वार कर।

ये घड़ी जो निराश है, समय बड़ा त्रास है।
वक्त ने चुना है तुझे, तू बड़ा खास है।

हर टिक टिक पे नजर रख ये कह रही कुछ बात है।
मत पूंछ शरीर क छालों से कितना परेशान है,
खेल कितना खेल सकता है मरना सबका ही अंजाम है.

न हालत देख न हाल देख वक्त को जो हराने का संकल्प है,
जुट जा तू इस जीवन संघर्ष में यही मात्र विकल्प है,
समेट अपने आप को टुकड़ा टुकड़ा जोड़ कर,
राम सा किरदार बन रखदे शिव धनुष तोड़ कर।

क्या हुआ जो मिट गया जो था तेरा वो लूट गया
नज़रों में गिर जाएगा खुद की जो तू पथ से हट गया।
बैठ न थक हारकर, लड़ता रह फिर वार कर।

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