" बाय दादा "

                                                       "  बाय दादा "

यूं तो हर व्यक्ति सुविधा अनुसार रेल गाड़ी का टाइम टेबल और अपने आने जाने का समय निश्चित करके घर से निकलता है, परन्तु भारत में एक वर्ग ऐसा भी है जो आवश्यकता के अनुसार कभी भी स्टेशन पर पहुंच कर स्टेशन पे ही यह पता करता है कि कौनसी गाड़ी कहां जाएगी और जो गाड़ी उस स्थान को जा रही है जहां उसे जाना है लपक कर उसकी जनरल बोगी में बैठ जाता है।

इस वर्ग के लिए ट्रेन का टिकट लेना उतना ही जरूरी है जितना उत्तर प्रदेश में बारहवीं करने के बाद स्नातक करना, होता कुछ नहीं पर फिर भी कर लेते हैं ताकि विवाह कार्य संपन्न हो जाए।

यूं तो जनरल बोगी को लोग दूर से देखकर भी पसीने छोड़ने लगते हैं पर कुछ लोगों के लिए ये वरदान का काम करती है, चूंकि टिकट कलेक्टर में इतनी जान नहीं होती कि वो इस डब्बे की भीड़ को चीरकर अंदर घुस जाए इसलिए टिकट न खरीद पाने वाले लोगों को इससे बहुत राहत मिलती है।

दफ्तर से रक्षा बन्धन की छुट्टियों में मैं अपने गांव गया था चूंकि ये निश्चय जल्दबाजी में हुआ था इसलिए मैंने बस से जाना उचित समझा, बस से लंबा सफ़र करने का मेरा कोई अनुभव नहीं था और इस सफ़र में मुझे पूरे सफ़र में उल्टियां करते करते ये पता चल गया था कि ये मेरे लिए हानिकारक है इसी लिए मैंने वापस आते वक़्त रेल से आने का मन बना लिया था।

मेरा गांव आगरा शहर में है, आगरा में आपको पूरा हिंदुस्तान दिखेगा तहजीब, तमीज और बदतमीज लोगों के लिए भी यहां उचित स्थान नियुक्त किए गए हैं ये किसी से छिपा नहीं है, यहां आपको बड़े बड़े धनवान भी दिखेंगे और दुआओं का भंडार आपकी झोली में डाल देने वाले फकीर भी।
रक्षा बंधन अच्छा बीता और जब छुट्टियां खतम हुईं तो वापस आते वक्त रेल का विकल्प ही चुना पर रिजर्वेशन ना होने की वजह से मैं जनरल डब्बे का टिकट लेकर लड़ता झगड़ता चढ गया किसी तरह, हुह क्या संघर्ष था डब्बे में चढ़ने में ।

में आगरा से वापस कहां आ रहा था ये तो बताना भूल ही गया, हां तो में आ रहा था दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन तक, मैं दिल्ली में ही एक संस्था में नौकर हूं।

रेल के सफ़र में फरीदाबाद स्टेशन तक आते आते भीड लगभग खतम सी हो गई थी और बैठने के लिए सीट भी मिल गई यहां तक आने में मेरे पांव एक ही पोज में खड़े खड़े सो गए थे पता नहीं ये शरीर के अंग इतने बेफिक्र कैसे होते हैं यदि व्यक्ति का मस्तिष्क भी इसी भांति होता तो शायद हर आदमी यूं परेशान न होता।

मेरी आगे वाली सीट पर एक महिला बैठी थी अपने दो छोटे छोटे मुन्ना और मुन्नी को लिए उस महिला को देख देख कर मेरा दिल मसोस उठता था, जिस देश में महिलाएं एक गांव से दूसरे गांव जाते समय सज धज के जाती हैं, लिपस्टिक, बिंदी, साफ सुथरी साड़ी और न जाने क्या क्या साज सज्जा का सामान पर ये महिला जो रेल का सफ़र कर रही थी एक राज्य से दूसरे राज्य का,  इसके पास तो न कोई साज सज्जा का सामान था और हालत भी बड़ी दयनीय थी।

एक धोती के चिथडों में लिपटी ये महिला शरीर से रोगिनी और हालत से भिखारिन से भी गई गुजरी लग रही थी।

जब गाड़ी फरीदाबाद स्टेशन पर रुकी तो फेरी वाले आवाज लगाने लगे चाय चाय समोसा समोसा और कुछ ताली बजाने वाले भी परेशान करने लगे।

जैसे ही कोई फेरी वाला आता इस महिला के मुन्ना और मुन्नी बिगड़ने लग जाते और वो चुप चाप रूआंसा सा मुंह लिए बैठी रहती मानो कह रही हो कि मेरे पास अपने शरीर के टुकड़ों के अलावा अगर कुछ होता तो मेरे लाडलों में तुम्हे सब दिला देती, पर छोटे बच्चे ख़ामोशी नहीं समझते उनको मां और बाबा के सामर्थ्य पर कभी संदेह नहीं होता उनके लिए तो मा- बाबा धन कुबेर हैं ।

इन मां और बच्चों की बातें सुनकर मुझे इतना अंदाजा हो गया था कि या तो ये बंगाली हैं या बंगाली जैसी भाषा बोलने वाले ओड़िआ या आसामी हैं।

जब शोर मचाते मुन्ना मुन्नी कुछ पाने के लिए रोने लगे तब उस दुखियारी से न रुका गया, एक थप्पड़ जमाया मुन्नी को और एक मुन्ने को उसके बाद खुद ही रोने लगी, ये देख मेरा कलेजा ठंडा पड़ गया और इस दृश्य को देख मेरी आंखें भर आईं।

अबकी बार जब फेरी वाला आया तो उसके पास चटपटे चने और फ्रूटी थी, मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाल कर चार चने के प्लेट और चार फ्रूटी लीं और एक एक मां और बच्चों को दे दीं उनके मुंह से एक बार भी ना न निकली , सच तो ये भी है जब भगवान आपको हर तरफ से निराश करदे तो आपका आत्म सम्मान हल्का पड़ जाता है।

बच्चे और मां चनों को ऐसे खा रहे थे मानो कई रोज के भूखे थे, खाते खाते बच्चों के मासूम चेहरे खुश न होकर चिंतित थे मानो कोई उनसे इस थोड़े से खाने को भी छीन न ले, ये देख मैंने अपने थैले से पूडी सब्जी और खोए के लड्डू जो हर घर से इस तरह रखी जाती हैं जैसे बेटा नौकरी पर नहीं जंग पर जा रहा हो पता नहीं खाने को मिलेंगी या नहीं उसमें से कुछ निकालकर उनके सामने रख दिए और उनके उदास चेहरों पर एक अनजान सी राहत देख कर मेरे दिल को जो सुकून मिला वो आज भी दिल के बड़े से कोने में सबसे अच्छा पल बना बैठा है।

मेरा स्टेशन आ पहुंचा पर इन लोगों को कहीं और जाना था जब में रेल से उतरने लगा तो मुन्ना और मुन्नी एक आवाज में बोले "बाय दादा" और उनकी मां हाथ उठाकर ऐसे आशीर्वाद दे रही थी जैसे कोई मां अपने बच्चे को अंतिम बार देख रही हो। यदि में भगवान होता तो इस पल को वहीं रोक देता और उस आत्म शांति के अनुभव को हमेशा हमेशा के लिए जीता। हमारे गांव में एक रिवाज है कभी भी विदा लेते वक्त बच्चों को कुछ देकर जाते हैं इसी लिए मैंने 20-20 के दो नोट दोनों गुड्डे और गुडिया को दे दिए।

वो पल आज भी मेरे जहन में जिंदा है, मानो कोई मेरा अपना मुझसे बिछड़ गया उस दिन जब भी वो पल याद आते हैं बस आंसू निकल आते हैं और एक दुआ निकलती है हे भगवान उस परिवार के दिन अच्छे कर देना।

  © ~ प्रवीन ठाकुर 

Comments

  1. वाहः हा दिल छू गयी शाबाश

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  2. Bhaisahb katai emotional krdiya

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  3. यथार्थ भावनात्मक चित्रण ...

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