एक बार फिर अंधेरा लुभा रहा है।

 ग्यारह बजे काम से लौटा था आज, कंपनी के कैफेटेरिया में मैं खाना नहीं खा पाता क्यूंकि केरल के लोग मांसाहारी हैं और मैं बचपन में राधे राधे की धुन पर ताली बजाकर खिलाया हुआ बच्चा। मुझे मांसाहारियों से कोई भी शिकायत नहीं पर किसी के रक्त, हड्डियों और प्राण को जो भूख खा जाए वो मुझे किसी राक्षस की परछाईं से कम नहीं लगती।


भूख तेज लग रही थी और खाना बनाने का मन मेरा था नहीं, इसलिए पुलाव ऑर्डर कर लिया उसके बाद थोड़ी देर छत पर टहल कदमी की फिर अब अपने कमरे की खिड़की के सहारे झिंगुरों की आती आवाज से शब्दों के सुरों का अभ्यास करने बैठ गया हूं।

कभी - कभी मैं खुद को बहुत सुलझा हुआ देखता हूं मानो कुछ महत्वकांक्षा ही ना हो जो भी हो रहा है राम कृपा से हो रहा है और जो भी होगा राम कृपा से होगा। मेरी दशा ठीक शीतनिद्रा में गए मेंढ़क जैसी होती है।

कभी कोई अजीब सी इच्छा कुछ कर दिखाने की, वास्तविक दुनियां को किनारे कर वस्तुविक दुनियां के नर और नारी रूपी जानवरों पर अपना प्रभाव जमाने की, मैं तुमसे बेहतर हूं बताने की होने लगती है। ये अहंकार, मोह और महत्वाांक्षाएं मुझे बार बार घेरने लगती हैं।

हर किसी के जीवन में रोज का संघर्ष है हम लेखकों की तो दिमागी बक्चोदी खत्म नहीं होती। किसी बच्चे के रोने पर भी उसे आइस क्रीम न मिले तो शायद उस बच्चे को भी इतना दुख न हो जितना उसका दुखी चेहरा देखकर मैं दिमागी दुखों का संसार बना लेता हूं, ऐसे उदास चेहरे मुझे सालों साल तक याद रह जाते हैं। उदास चेहरों से कितनी कहानियां टपक रही होती हैं पर मैं उन कहानियों को समेटने के बजाय उनकी मुस्कुराहट की वजह बनने की कोशिश करता हूं।

काश मैं चिड़ियों से बात कर पाता, काश पेड़ों की गर्दन सहलाकर रात के इस अंधेरे में मैं उनसे पूछता और भई सारे दिन यहां खड़े खड़े कैसे गुजरा दिन? और पेड़ पर दिन भर की थकी मांदी चिड़िया और पेड़ मिलकर मुझे सारे दिन की मेहनत भरी जिंदगी के फसाने सुनाते।

आदमी जात के जिंदगी के चोचले सुन सुन कर पक गया हूं, नौकरी, पैसा, समाज और सामाजिक स्तर के दुखड़े अब मुझे रस नहीं देते। ऐसे लगता है आदमी ने अपनी जिंदगी के चैन और सुकून को छोड़कर, अपनी दकियानूसी को छोड़कर पूरी दुनियां को सुधारने का ठेका ले रखा है।

उस चीख से मेरा रिश्ता क्या था?
जो तुम्हारी हलक से निकल ही न पाई।
तुम्हारी हंसी से कोई बैर तो नहीं मेरा,
पर तुम्हारे चेहरे की उदासी समझ नहीं आई।

उस शाम से रिश्ता क्या रखूं,
जो मुझे नशे से तर न कर पाए।
उस रास्ते पांव मैं क्या रखूं,
जो कुछ घाव भी गहरे न दे पाए।

उस हवा में सांस लेना दूभर था,
पर हवा बदलकर भी क्या रास आए?
फितरत में जिनके हो फकीरी,
उन्हें शोहरत की खनक क्या ठहराए।

कोशिश की कविता को पूरी कर दूं पर कुछ बन ही नहीं रहा, कितना प्यारा माध्यम है गागर में सागर भर देने का।
कविता एक ऐसा माध्यम है जिससे एक जमाने को बस एक पन्ने में समेटा जा सकता है।





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