समय से मार खाया इतिहास
अंधकार के पीछे मोमबत्ती लेकर चलता हुआ मनुष्य समझता है कि संसार को राह दिखाने का ठेकेदार वही है,
उसके पीछे चल रही भीड़ उसके निर्देशों पर चलेगी, और काट देगी समय की तारीखों के गले, ऐसी गलतफहमियां पालकर मानव जाति को तंग करता हुआ व्यक्ति एक दिन हदें पार कर देता है, सारी मानवीय करुणाओं को ताक पर रखकर उजाड़ना शुरू कर देता है बने बनाए और सजे सजाए घरों को। पर वो भूल जाता है कि समय का एक सूर्य भी है, जिसकी रोशनी चीर देती है उस राह भटके हुए व्यक्ति को जो अपना महत्व आवश्यकता से अधिक समझ लेता है। आज बात करेंगे उन तुच्छ इतिहासकारों की जिन्होंने अपने आप को सास्वत समझने की भूल करी पर खुशनसीब हैं ये इतिहासकार कि इनके जीवित रहते ही इनकी गढ़ी गई गाढ़ी गंध मारती इतिहास की सड़ी- सड़ाई शिक्षा अब इनके मुंह पर ही चुपड़ी जा रही है। दरअसल इतिहास एक ऐसा शब्द है जिससे छेड़छाड़ मनुष्य ने कई बार करने की कोशिश करी, जाने कितने इतिहास धरती में गढ़े हुए मिले, इतिहास तो जमीन खोदकर फिर से वट का विशाल वृक्ष बनकर निकल आता है, पर मर जाते हैं उस इतिहास को छुपाकर दुनियां जितने की कोशिश करने वाले लालची और अहंकारी लोग, जिनकी जमीन से निकली सड़ी हड्डियां बताती हैं कि क्या अंजाम होता है उनका जो दुराचार करके भी इतिहास में खुद को सदाचारी लिखवा लेते हैं। इन इतिहासकारों की ऐसी ही करतूत है एक गौरवशाली इतिहास पर पर्दा डालकर लुटेरों और बलात्कारियों को लाइम लाइट में लाकर दयालु और सुसाशनकर्ता दिखाने की। ये गौरव शाली इतिहास है गुजरप्रतिहारों का जिनकी तलवारों ने काटी वो लालच में लपलपाती मजहबी जीभें जो सवाब के नाम पर लूटना चाहती थीं भारत की असीम और अपार धन संपदा को, इनकी भुजाओं के बल ने सदियों तक मिट्टी में रमेटकर रखे उन दरिंदों के लूट खसूट वाले इरादे और बुलंद किया उस भगवा ध्वज को जिसकी हर सुंदर लहराती लहरियों को लहराते रहने के लिए मांओं ने जन्मे वो सुरमे जिन्होंने अपनी गर्दनें अड़ा दीं उस खूनी तलवार के आगे जो मिटाना चाहती थी दुनियां की सारी सुंदरता जो छीनना चाहती थी महिलाओं की आजादी, जो बंद करके रख देना चाहती थी एक काले बोरे में उस धरती की औरतों को जिन्हें आता था घोड़े पर चढ़कर आसमान छूना और रौंद डालना दुश्मनों की छाती और इरादे। प्रतिहार शब्द का अर्थ है रखवाली करने वाला और प्रतिहारो ने इस सनातन भूमि की न केवल रखवाली की बल्कि भय का जो दबदबा अरबी मजहबी खच्चरों के मन में भर कर रखा उसे इतिहासकारों ने मुगलिया काल की कालिख से पोत कर छुपाने की कोशिश की पर जमीन पर टपका प्रतिहारो का खौलता रक्त उस विशाल क्रांति के रूप में फिर खड़ा होगा जिसके तपन से धरती भी पसीना पसीना हो जाएगी। आठवीं सेंचुरी से लेकर बारह सेंचुरी तक प्रतिहारो ने भारत भूमि को मलेछ मुक्त रखा, और राजपूत शासनों की शुरुआत भी इसी शासन की शुरुआत से हुई। गुजर वंश ने पहले उज्जैन और फिर कन्नौज से शासन किया। प्रतिहार वंश के पहले शासक थे नागभट प्रथम जिन्होंने (730-756) तक शासन किया। 730 CE में अरबी लुटेरों की गंदी नजर जब भारत की ओर घूमी तो नागभट की अगुआई में छोटे छोटे आदिवासी लोगों ने भी उन जन्नत के ख्वाब देखने वाले और युद्ध में सबाब लूटने की इच्छा रखने वाले लालची योद्धाओं को आड़े हाथों लेकर खदेड़ दिया। अरब की सेना बड़ी थी क्योंकि जन्नत और सबाब के लालच में सेना के अतिरिक्त मजहब के नाम पर आम लोग भी लड़ने आते थे, लेकिन नागभट की अगुआई में जुनैद और तमीम नाम के आर्मी कमांडर की सेना को हराया। नागभट के बाद दो और शासकों के बाद वत्सराज ने शासन किया 775 - 805 तक, उसके बाद नागभट द्वितीय ने 805 से 833 तक शासन किया नागभट द्वितीय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली शासक थे। नागभट द्वितीय के बाद रामभद्र और फिर मिहिर भोज और मिहिर भोज के बाद उनके पुत्र महिंदरपाल ने शासन संभाला। मिहिर भोज ने 46 साल तक शासन किया, मिहिर भोज भगवान विष्णु के भक्त थे उन्होंने आदिवरः नाम का टाइटल भी लिया। आज भोपाल नाम से मशहूर शहर मिहिर भोज का ही बसाया हुआ है और उस समय भोजपाल यानी कि भोज द्वारा पाली गई नगरी कहा जाता था भोपाल को। मिहिर भोज के बाद महिन्द्र पाल और उसके बाद गुजर प्रतिहारवंश कमजोर होता गया क्योंकि फिर राजपूतों में आपसी दरारें शुरू हो चुकी थीं, जिन मजहबी इरादों को सनातनी तलवारें रौंदती आ रही थीं अब उन्हें समझ आ गया था कि सीधे सीधे युद्ध में हर हर महादेव चिल्लाने वाली सेनाओं से लड़ना आसान नहीं और ऊपर से जान के लाले हैं। महिंदप्राल तक आते आते परमार, चौहान, तोमर और राष्ट्रकूट सभी राजपूत मजबूत और शक्तिशाली हो गए थे। तब उन लालची मजहबी सेनाओं ने खुरापातें और आपसी फूट डलवाना शुरू की, शासकों को बहलाना फुसलाना और सत्ता के लालच दिखाकर भारत की द्वारपाल तलवारों को एक दूसरे की तरफ मोड़ दिया और चुपके से घुस आए उस धरती में जो उनके मजहब की जन्नत से भी सुंदर दिखती है। राजपूत शासकों के आपस के बैर की वजह से पहले तराइन के युद्ध में सफेदी चाट चुका गोरी 1192 में भगवा तलवारों के आपसी फूट का फायदा उठाने में सफल रहा। और फिर इस देश ने आपसी मन मुटावों की वजह से झेला लुटेरों को, आततियों को, दुराचारियों को और लुटाई अपनी धन सम्पदा उनके हाथों जिन्होंने कभी देखी भी नहीं थी। इसके बाद भी इन दुराचारियों के कारनामों को वैसा का वैसा ही दर्ज नहीं किया गया छुपा दी गई भगवा झंडे तले खड़े होकर महादेव की गूंज जिसमें सारे के सारे अरब का भूत भाग जाता था। और लिख दिया गया चोर डकैतों को राजा। आधुनिक भारत में भी इतिहास को राजनीति शस्त्र की तरह प्रयोग करके घायल किया जाता है उस इतिहास को जिसे भारत की भगवा सेनाओं के सामने लाने से ज्वालामुखी फिर से जीवंत हो उठेगा। पर ये तुच्छ इतिहासकारों को याद नहीं कि धरती उस तपते रक्त को संभाल नहीं सकती वो विशाल और गौरवमई इतिहास अब भारत का बच्चा बच्चा जानेगा और उस बच्चे बच्चे तक पहुंचाओ आप शेयर करके
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